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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

पुस्तक परिचय-20 : अक्षरों के साये

पुस्तक परिचय-20

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1. व्योमकेश दरवेश, 2. मित्रो मरजानी, 3. धरती धन न अपना, 4. सोने का पिंजर अमेरिका और मैं, 5. अकथ कहानी प्रेम की, 6. संसद से सड़क तक, 7. मुक्तिबोध की कविताएं, 8. जूठन, 9. सूफ़ीमत और सूफ़ी-काव्य, 10. एक कहानी यह भी, 11. आधुनिक भारतीय नाट्य विमर्श, 12. स्मृतियों में रूस13. अन्या से अनन्या 14. सोनामाटी 15. मैला आंचल 16. मछली मरी हुई 17. परीक्षा-गुरू 18. गुडिया भीतर गुड़िया 19. स्मृतियों में रूस

अक्षरों के साये

 

clip_image001इस सप्ताह हम आपका परिचय कराने जा रहे हैं अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा “अक्षरों के साये” से। इसके प्रकाशन के बीस वर्ष पूर्व उन्होंने “रसीदी टिकट” (1977 ) लिखा था। यह आत्मकथा अध्यात्म से जुड़े धरातल पर उनके समग्र जीवन का विवरण प्रस्तुत करती है। उनके चिंतन का कमाल हमारे सामने एक नितांत नवीन दुनिया के भीतर झांककर देखने की उनकी अदम्य इच्छा के रूप में आता है।

110429174542e723L280हिंदी तथा पंजाबी लेखन में स्पष्टवादिता और विभाजन के दर्द को एक नए मुकाम पर ले जाने वाली अमृता प्रीतम ने अपने साहस के बल पर समकालीन महिला साहित्यकारों के बीच अलग जगह बनाई। अमृता जी ने ऐसे समय में लेखनी में स्पष्टवादिता दिखाई, जब महिलाओं के लिए समाज के हर क्षेत्र में खुलापन एक तरह से वर्जित था। एक बार जब दूरदर्शन वालों ने उनके साहिर और इमरोज़ से रिश्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा,

“दुनिया में रिश्ता एक ही होता है – तड़प का, विरह की हिचकी का, और शहनाई का, जो विरह की हिचकी में भी सुनाई देती है यही रिश्ता साहिर से भी था, इमरोज़ से भी है…”-

अमृता जी का साहस और बेबाकी ने उन्‍हें अन्‍य महिला लेखिकाओं से अलग पहचान दिलाई। जिस जमाने में महिलाओं में बेबाकी कम थी, उस समय उन्‍होंने स्‍पष्‍टवादिता दिखाई। यह किसी आश्‍चर्य से कम नहीं था।

1963 की बात है। विज्ञान भवन में एक सेमिनार था। उसमें लेखिका ममता कालिया ने उनसे पूछा कि आपकी कहानियों में ये इंदरजीत कौन है? इसपर अमृता जी ने एक दुबले पतले लड़के को उनके आगे खड़ा करते हुए कहा, “इंदरजीत ये है। मेरा इमरोज़।” उनके इस खुले तौर पर इमरोज को मेरा बताने पर वो चकित रह गई। क्‍योंकि उस समय इतना खुलापन नहीं था। इसी तरह से उनका बेबाकी से स्वीकार करना कि यह साहिर की मुहब्बत थी, जब लिखा …

फिर तुम्हें याद किया, हमने आग को चूम लिया

इश्क ज़हर का प्याला सही, मैंने एक घूंट फिर से मांग लिया

और इमरोज़ की सूरत में – अहसास की इन्तहा देखिए, एक दीवनगी का आलम ही था,

कलम ने आज गीतों का काफ़िया तोड़ दिया

मेरा इश्क यह किस मुकाम पर आया है।

उठो! अपनी गागर से-पानी की कटोरी दे दो

मैं राहों के हादसे, उस पानी से धो लूंगी-

अमृता जी की रचनाएं बनावटी नहीं होती थी। यह उनकी लेखिनी को खास बनाता है। अमृता जी जो भी लिखती थी, उसमें आम भाषा की सरलता झलकती थी। यही उनकी रचनाओं को लोकप्रिय बनाता था।

विभाजन के बाद अमृता लाहौर से भारत आई थी। लेकिन उन्‍हें दोनों देशों में अपनी रचनाओं के लिए ख्‍याति मिली।

1956 में उन्‍हें साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार पाने वाली वो पहली महिला थी।

1969 में पदमश्री और पद्म विभूषण से नवाजा गया। 1982 में उन्‍हें कागज ते कैनवास के लिए साहित्‍य का सर्वोच्‍च पुरस्‍कार, ज्ञानपीठ मिला।

1986 से 1992 तक वो राज्‍यसभा की सदस्‍य रहीं। 2003 में उन्‍हें पाकिस्‍तान की पंजाबी अकादमी ने भी पुरस्‍कृत किया। इस पर उन्‍होंने कहा था , बड़े दिनों बाद मेरे मायके को मेरी याद आई।

हालाकि अमृता जी का उपन्‍यास पिंजर भी विभाजन के दर्द को अलग तरह से दिखाता है, पर उन्‍हें सबसे ज्‍यादा उनकी कविता “अज अक्‍खां बारिस शाह नू” के लिए जाना जाता है। इसमें उन्‍होंने विभाजन के दर्द को मार्मिक तौर पर पेश किया है।

ज़मीन पर लहू बहने लगा-

इतना- कि कब्रें चूने लगीं

और मुहब्बत की शहज़ादियां

मज़ारों में रोने लगीं

सभी कैदों में नज़र आते हैं

हुस्न और इश्क को चुराने वाले

और वारिस कहां से लाएं

हीर की दास्तान गाने वाले

तुम्हीं से कहती हूं-वारिस!

उठो! कब्र में से बोलो

और इश्क की कहानी का

कोई नया वरक खोलो

उनकी आत्‍मकथा “रसीदी टिकट” उनकी कालजई रचनाओं में से एक है। “रसीदी टिकट” में दिए जीवन के ब्योरे में यथार्थ की अनुगुंज अधिक सुनाई पड़ती है और सबकुछ अपनी मुट्ठी में बंद करने की ऊर्जा भी सक्रिय दिखती है। लेकिन उनकी इस पुस्तक “अक्षरों के साये” तक आते-आते उनकी परिपक्वता चरमोत्कर्ष पर है। सबसे नायाब चीज़ उन्हें प्रेम का मोती मिला, उसकी चमक आध्यात्मिक चमक के रूप में आलोकित करने का प्रयास किया है। कहती हैं,

“मुहब्बत का अग्नि-कण कवि को मिलता है, पर यह अग्नि-कण जब कविता बन जाता है, अपनी किस्मत का प्याला, उसे भी अपने होठों से पीना होता है.

उन्होंने इस अत्मकथा में मानवता की स्थापना पर अपनी बेबाक टिप्पणी लिखी है। साम्प्रदायिकता को भी दरकिनार कर दिया है, और एक मुक्कमल लेखिका के रूप में हमारे सामने प्रकट होती हैं।

कोई अपने हाथ में पत्थर उठाता है

तो पहला ज़ख्म इंसान को नहीं,

इंसानियत को लगता है।

और सड़क पर जो पहली लाश गिरती है,

वह किसी इंसान की नहीं होती, इंसानियत की होती है

उनका मानना है मज़हब के नाम पर जितना कत्लो-खून हुआ वह हमारे देश की स्वंतंत्रता का बहुत बड़ा उलाहना है …

जैसे इश्क की ज़बान पर एक छाला उभर आया हो

जैसे सभ्यता की कलाई से एक चूड़ी टूट गई हो

इसी तरह इस पुस्तक में कलम के कर्म के बारे मे बताते हुए कहती हैं कि इसके अनेक रूप होता है:

वह बचकाने शौक में से निकले तो जोहड़ का पानी हो जाता है;

अगर सिर्फ़ पैसे की कामना में से निकले तो नकली माल हो जाता है;

अगर सिर्फ़ शोहरत की लालसा में से निकले तो कला का कलंक हो जाता है;

अगर बीमार मन में से निकले तो ज़हरीली आबोहवा हो जाता है;

अगर किसी सरकार की ख़ुशामद में से निकले तो जाली सिक्का हो जाता है।

वो एक मात्र कवयित्री हैं जो तुलिका से कविता को चित्रित करती हैं और उसके रंगों का चयन देख कर दांतों तले उंगली चली जाती है। बानगी देखिए ज़रा, लग रहा है मानों सारे अक्षर चांद पर से गिर रहे हैं।

मेरी खामोशी की गली से

अक्षरों के साए गुजरते रहे

चांद की मटकी से जब-

कतरे से कुछ गिरते रहे

रात की दहलीज़ पर-

तारे दुआ करते रहे

अज्ञेय रचित “शेखर एक जीवनी” उपन्यास की पंक्ति है “दर्द से भी बड़ा विश्‍वास है।” …. यही विश्‍वास अमृता प्रीतम के लेखन में दिखता है और यही बल उन्हें इस मुकाम पर पहुंचाता है।

कभी तो कोई इन दीवारों से पूछे-

कि कैसे इबादत गुनाह बन गई थी

***

 

पुस्तक का नाम

अक्षरों के साए

लेखिका

अमृता प्रीतम

प्रकाशक

राजपाएंड संस, कश्मीरी गेट, नई दिल्ली-110006

संस्करण

संस्करण : 2008

मूल्य

140 clip_image002

पेज

145