बुधवार, 3 अगस्त 2011

भारतेन्दुकाल के अन्य नाटककार


नाटक साहित्य-7

भारतेन्दुकाल के अन्य नाटककार 

भारतेन्दु ने हिंदी नाट्यकला के प्रवर्तक के रूप  में जो नेतृत्व दिया उससे प्रभावित होकर उनकी ही छत्र-छाया में एक मंडल साहित्य क्षेत्र अवतरित हुआ। इनमें से कई भारतेन्दु जी के योगदान से उत्साहित होकर नाटककार बने। उन्होंने भारतेन्दु जी की शैली का अनुसरण करते हुए नाटक लिखे और हिंदी नाटक साहित्य को समृद्ध किया। भारतेंदु जी के निधन के बाद भी बहुत दिनों तक यह मंडल साहित्य का निर्माण करता रहा।

भारतेन्दु काल में जो नाटक रचे गए उन्हें विषय एवं प्रवृत्ति के आधार पर पौराणिक, ऐतिहासिक, रोमानी, सामयिक अदि वर्गों में रखा जा सकता है। जैसे कृष्ण चरित्र संबंधी नाटक, राम चरित्र संबंधी नाटक, एवं अन्य पौराणिक आख्यानों पर आधारित नाटक। इसके अलावा प्रहसन और प्रतीकवादी नाटक भी लिखे गए।

मौलिक नाटक

इस श्रेणी के नाटककारों में प्रमुख हैं –

अंबिकादत्त व्यास कृत : ‘ललिता’ (1884) कृष्ण चरित्र, ‘गौ संकट’ और ‘भारत-सौभाग्य’ (1887), हरिदत्त दूबे कृत : ‘महारास’ (1885) और ‘कृष्ण चरित्र’, खड्गबहादुर मल्ल कृत  महारास (1885), कल्पवृक्ष (1886), ‘रति-कुसुमायुध’, (1885), और ‘भारत-ललना’ (1885), सूर्यनारायण सिंह कृत ‘श्यामानुराग नाटिका (1899), चन्द्रशरण कृत ‘उषाहरण (1887), कार्तिकप्रसाद वर्मा कृत ‘उषाहरण’ (1892), अयोध्या सिंह उपाध्याय कृत ‘प्रद्युम्न विजय’ (1893) और रुक्मिणी परिचय (1894), देवकीनन्दन खत्री कृत ‘सीता हरण’ (1876) और रामलीला (1879), शीतलाप्रसाद त्रिपाठी कृत रामचरितावली (1887), ज्वालाप्रसाद मिश्र कृत ‘सीता-वनवास (1895), द्विजदास कृत रामचरित्र नाटक (1891), लाला श्रीनिवास दास कृत ‘प्रह्लाद चरित्र’ (1888), ‘संयोगिता-स्वयंवर’ (1896), ‘रणधीर-प्रेममोहिनी’ (1877) और ‘तप्ता संवरण’ (1883), ** ‘रणधीर-प्रेममोहिनी’ हिन्दी का पहला दुखान्त नाटक है। बालकृष्ण भट्ट कृत‘नलदमयंती स्वयंवर’ (1895), ‘नयी रोशनी का विष’ (1884), ‘जैसा काम वैसा परिणाम’ (1877), ‘आचार विडंबन (1899) और ‘वेणु संहार’, राधाचरण गोस्वामी कृत  ‘अमर सिंह राठौर’ (1895), ‘बूढ़े मुंह मुंहासे’ (1886), ‘सती चन्द्रावली’ ‘श्रीदामा’, ‘तन-मन-धन गोसाईं जी के अर्पण’ और ‘भंग-तरंग’, राधाकृष्ण दास कृत ‘महाराणा प्रताप’ (1898), ‘दुखिनी बाला’ (1880), ‘महारानी पद्मावती’ और ‘धर्मालाप, गजराज सिंह कृत ‘द्रौपदी-हरण’ (1885), शालिग्राम वैश्य कृत ‘अभिमन्यु’ (1896) और ‘लावण्यवती सुदर्शन’ (1892), किशोरीलाल गोस्वामी कृत ‘प्रणयिनी-परिणय’ (1890) और मयंक मंजरी’ (1891), गोकुलनाथ शर्मा कृत – ‘पुष्पवती’ (1899), गोपालराम गहमरी कृत ‘देश-दशा’ (1892), काशीनाथ खत्री कृत ‘विधवा-विवाह’, देवकी नन्दन त्रिपाठी कृत ‘भारतहरण’ (1899), ‘जय नरसिंह की’ (1876), कलियुग जनेऊ’ (1886) और कलियुगी विवाह (1898), विजयानंद त्रिपाठी कृत ‘महाअंधेर नगरी’ (1893), प्रतापनारायण मिश्र कृत ‘कलिकौतुक रूपक’ (1886), ‘भारत दुर्दशा रूपक’, ‘कलि प्रभाव’, ‘जुआरी खुआरी’, ‘गोसंकट’ और ‘हठी हमीर’, कमलाचरण मिश्र कृत ‘अद्भुत नाटक’ (1885), रतनचंद्र कत ‘न्याय सभा’ (1892), शंकरानंद कृत ‘विज्ञान’ (1897), विन्ध्येश्वर प्रसाद त्रिपाठी कृत ‘मिथिलेश कुमारी (1889), शालिग्राम वैश्य कृत ‘मोरध्वज’ (1890), जगन्नाथशरण कृत ‘प्रह्लाद-चरितामृत’ (1900), देवराज कृत ‘सावित्री’ (1900), अनूप कवि कृत ‘लंका विजय’ (1900), रामनाथ कृत ‘सावित्री-सत्यवान’ (1900), केशवराम भट्ट कृत ‘संजाद-सुंवुल’ (1877), अमनसिंह गोतिया कृत ‘मदन-मंजरी (1884), विशेसरनाथ पाठक कृत ‘लवंगलता’ (1885), कृष्णदेव सिंह कृत ‘माधुरी’ (1888), दामोदर सिंह कृत ‘मदन-लेखा’ (1890), रामानंदसिंह कृत ‘कुवलय-माला’, ब्रजप्रसाद कृत ‘मालती-वसंत (1889), रामनरेश शर्मा कृत ‘सिंहल-विजय’ (1896), जगतनारायण शर्मा कृत ‘भारत दुर्दिन’ (1889), बदरीनारायण चौधरी कृत ‘भारत सौभाग्य’ (1889), ‘प्रयाग रामागमन’ और ‘वीरांगना रहस्य नाटक’, दुर्गादत्त कृत ‘वर्तमान दशा’ (1890)।

अनूदित नाटक


अनुवाद मुख्यतः संस्कृत, बंगला और अंग्रेज़ी से किए गए। अनुवादों से नाटक साहित्य को नवीन दृष्टि प्राप्त हुई। संस्कृत भाषा से भवभूति और कालिदास के नाटकों के अनुवाद अधिक हुए। जिनमें से प्रमुख हैं उत्तररामचरित, अभिज्ञानशकुंतलम, मालविकाग्निमित्र, प्रबोधचन्दोदय, मृच्छकटिकम, रत्नावली। जिन लोगों ने अनुवाद किए उनमें प्रमुख नाम हैं, लाला सीताराम, नंदलाल विश्वनाथ दूबे।

बंगला से सर्वाधिक अनुवाद माइकेल मधुसूदन के नाटकों का हुआ जैसे पद्मावती, शर्मिष्ठा आदि। बंगला से हिंदी में अनुवाद करने वालों में रामकृष्ण वर्मा का नाम उल्लेखनीय है।

अंग्रेज़ी से सबसे अधिक अनुवाद शेक्सपियर के नाटकों का हुआ। लाला सीताराम, पुरोहित गोपीनाथ आदि ने इन नाटकों का अनुवाद किया।

भारतेन्दुकाल के लेखकों की विशेषता बताते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं, “हरिश्चन्द्र काल के सब लेखकों में अपनी भाषा की प्रकृति की पूरी परख थी। वे संस्कृत के ऐसे शब्दों और रूपों का व्यवहार करते थे जो विशिष्ट समाज के बीच प्रचलित चले आते हैं। जिन शब्दों या उनके जिन  रूपों से केवल संस्कृताभ्यासी परिचित होते हैं और जो भाषा के प्रवाह के साथ ठीक चलते नहीं उनका प्रयोग वे औचट में पड़कर ही करते थे।”

जब देश में ऐसी स्थिति थी कि देशभक्ति को राजद्रोह, हिन्दी प्रेम को अज्ञान और नाट्यकला को ग्राम्य समझा जाता था, भारतेन्दु जी और उनकी मंडली ने देश-दशा की मार्मिक व्यंजना अपने नाटकों में की। प्रतिकूल परिस्थित्तियों के अन्तर्गत अनुकूल वातावरण का सृजन व्यक्ति की महानता का द्योतक है। भारतेन्दु जी का व्यक्तित्व ऐसा ही महान था। उनका सहज औदार्य ऐसा अप्रतिम था कि उन्हें अपना सर्वस्व लुटाने में रस मिलता था। उनका सरल औदार्य और स्वाभाविक सारस्य ने उनके साहित्य को महान बनाया। उनके सम्पर्क में आनेवाले भी इससे सम्पन्न हुए। उनका दृष्टिकोण व्यापक था।

भारतेंदु काल में नाटक का जहां एक ओर उद्देश्य जनता को मनोरंजन प्रदान करना था वहीं साथ ही यह भी लक्ष्य था कि जनमानस को जागृत किया जा सके। इन नाटकों में त्याग, न्याय, सत्य, उदारता आदि मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था उत्पन्न कराने का प्रयास किया गया। इस बात पर भी बल दिया गया कि हममें हमारी संस्कृति के प्रति प्रेम जगे, समाज का सुधार और परिष्कार हो। जहां एक ओर संस्कृत नाट्यशास्त्र की मर्यादाओं की रक्षा की गई वहीं दूसरी ओर पाश्चात्य नाट्यशास्त्र से भी प्रेरणा ग्रहण की गई। इन सब के आधार पर हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहें तो, “भारतेंदु और उनके सहकर्मियों ने जीवन को साहित्य में निर्बाध विकसित होने का मार्ग दिखा दिया।”
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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सटीक और सार्थक आलेख्।

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  2. अन्य युगों की ही तरह,उस काल का नाट्य-लेखन भी तत्कालीन सामाजिक परिवेश और समस्याओं पर आधारित था।

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  3. वृहद जानकारी .. इतने सारे नाटक कारों के तो नाम से भी परिचित नहीं थी .

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