गुरुवार, 11 अगस्त 2011

छायावाद और स्वछंदतावाद

छायावाद और स्वछंदतावाद

vcm_s_kf_repr_717x724अनामिका

यूरोप में स्वछंदतावादी (Romantic) कविता का समय सन 1768 से 1832 इ. तक माना जाता है. उस काल की कविता की प्रवृति बहुत कुछ छायावादी कवियों से मिलती है. अतः प्रसंगवश रोमांटिक कविता की मुख्य प्रवृतियाँ लिखना आवश्यक है - क्यूंकि कई साहित्यकारों के मत से अंग्रेजी का स्वछंदतावाद ही हिंदी में छायावाद के नाम से अभिव्यक्त हुआ. किन्तु  यदि शुक्ल जी के उस मत को, जो उन्होंने फ़्रांस के संतों के सम्बन्ध में प्रकट किया है और जिसके आधार पर हिंदी की कविता छायावादी कहलाती है, मान लिया जाए तो स्वछंदतावाद और छायावाद दो भिन्न शैलियाँ हो जाती हैं.

इस बात को तो सभी स्वीकार करते हैं कि जिस प्रकार क्लासिक कविता की रूढ़िबद्ध पद्धति से ऊबकर अठारवीं शताब्दी के अंत में यूरोप में नवयुवक कवियों ने विद्रोह किया, ठीक उसी प्रकार बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में द्विवेदी युग की परंपरागत शैली के विरोध में भारत के छायावाद का जन्म हुआ. परम्परा से विद्रोह करनेवाला युवक वर्ग प्रत्येक देश में वस्तुगत, रूपगत एवं शैलीगत रूढ़ियों की श्रृंखला को तोड़ फेंकता है. रोमांटिक कवियों ने इंग्लॅण्ड में रूढ़ियों को तोड़कर जो कवितायेँ कीं, उनमें निम्नलिखित विशेषताएं पाई जाती हैं. देखना है कि इनमें कौन कौन विशेषता छायावादी कवियों में भी मूलरूप में विद्यमान है.

रोमांटिक कविता के लक्षण

स्वछंदतावादी काव्य वह काव्य है जिसमें उस भावुकतामय जीवन की प्रधानता हो जो कल्पना की दृष्टि से उदीप्त अथवा निदृष्ट हुआ हो और जिसमें स्वयं कवि की आत्मा इस कल्पना दृष्टि को सशक्त बनाती एवं निर्देश करती रहती हो.

स्वछंदतावाद की विशेषता : 

- वस्तुगत साम्य

रोमांटिक कवियों द्वारा निबद्ध काव्य वस्तु में छायावादियों के सामान निम्नलिखित बातें बताई जाती हैं -

1. शास्त्रवहिर्भूत कल्पित देशों, मध्ययुग या अतीत युग के राष्ट्रीय गौरव के आकर्षण दृश्य तथा मोहक संस्कृति का मनोहर चित्रण

2. रंग गत सामंजस्य की अपेक्षा उत्तेजक एकांगी रंगों पर बल देना,

3. प्रकृति को व्यक्तिगत और अव्यवहृत प्रत्यक्ष अनुभूति का विषय समझना और विशेष भाव से उसके उद्धत और उद्दाम वेग वाले रूप पर बल देना,

4. रहस्यवाद और अति प्राकृत तत्व में विश्वास,

5. कालरात्रि , शमशान, मकबरा, विनाश, नियति-चक्र , प्रलय, झंझा आदि का भूरिशः आश्रयण, और

6. स्वप्नलोक, अवचेतन चित्त और आवेशावस्था की बातें.

- प्रवृति गत साम्य

1. अत्यंत वैयक्तिक दृष्टिकोण

2. इनका नायक या तो वेदना ग्रस्त, विरक्त क्लांत, आत्म केन्द्रित व्यक्ति होता है या समाज के विरुद्ध भभकता हुआ विद्रोही, और दोनों ही अवस्थाओं में उसका व्यक्तित्व रहस्यमय होता है.

3. कवि द्वारा निबद्ध काव्य नायक तो इस प्रकार का व्यक्ति होता है , किन्तु स्वयं कवि अन्तर्दर्शी, मर्मग्य व्यक्ति होता है

4. वह तर्क की अपेक्षा भावावेग को, यथार्थ की अपेक्षा आदर्शवाद को, परिस्थितियों से समझौता करने की अपेक्षा महत्वाकांक्षा को अधिक गौरव देता है.

- शैलीगत साम्य

1. नियमों और रूढ़ियों से स्वतंत्र रहने का दावा

2. स्वतःप्रवृत  भावावेग पर बल

3. दिवास्वप्न जैसी कल्पना या असंलग्न चिंता प्रवाह, अस्पष्टता, युगपत सौन्दर्यानुभूति तथा कलात्मक प्रक्रिया की ओर प्रवृत होना.

8 टिप्‍पणियां:

  1. छायावाद और स्वछंदतावाद पर अच्छी जानकारी. कृपया स्वछंदतावाद के प्रमुख कवियों के नाम एवं उनकी स्वछंदतावादी रचनाओं से भी अवगत कराएं.

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  2. विषय को उठाया अच्छा है किन्तु जल्दी में समेट दिया.. बिना उदहारण के अधूरा है आलेख...

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  3. कुछ कमी सी है! लगता है बंद लगी होने खुलते ही..!!

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  4. सभी सुधि पाठकों ने इतनी रूचि दिखाकर मेरा मनोबल बढाया इसके लिए आभारी हूँ. छायावाद का विषय अभी सिमटा नहीं है इस पर आगे भी चर्चा जारी रहेगी.

    शुक्रिया.

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  5. @ शरद जी,
    आज शुक्ल जी की स्थापना निर्विवाद रूप से स्वीकृत है कि रीतिकालीन रूढ़ियों को तोड़कर स्वच्छंदता का आभास पहले पहल पं. श्रीधर पाठक ने ही दिया। किन्तु इस स्वच्छंदतावाद के विकास की जो रूपरेखा आचार्य शुक्ल ने प्रस्तुत की है उसके बाते में बाद के विद्वानों में सहमति न हो सकी फिर भी शुक्ल सी के अनुसार रामनरेश त्रिपाठी, मुकुटधर पांडेय, माखनलाल चतुर्वेदी, सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्राकुमारी चौहान, गुरुभक्त सिंह भक्त, उदयशंकर भट्ट आदि।

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