शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

नाटक साहित्य – प्रसाद युग

600 वीं पोस्ट
नाटक साहित्य-8
नाटक साहित्य – प्रसाद युग
मनोज कुमार
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के निधन के पांच वर्ष बाद प्रसाद जी का जन्म एक समृद्ध परिवार में 30 जनवरी 1890 में हुआ था। इनके पिता देवीप्रसाद का व्यापार वैभव काशी, कलकत्ता आदि कई प्रमुख नगरों में फैला था। यह परिवार अपने विद्या प्रेम और दानवीरता के लिए विख्यात था। किशोरावस्था तक प्रसाद जी का लालन-पालन सामंती वातावरण में हुआ। किन्तु प्रसाद जी की 11 वर्ष की अवस्था में पिताजी का स्वर्गवास हो जाने से वह वैभव ह्रासोन्मुख बन गया। 14 वर्ष की अवस्था में माता जी की मृत्यु हो गई।

पैत्रिक सम्पत्ति के विभाजन के कारण परिवार में फूट पड़ गई। न्यायालय में अभियोग पर अभियोग चलने लगे। चार वर्ष में लाखों रुपये व्यय हुए। अतः व्यवसाय बन्द हो गया। दुकानों पर ताले लग गए। बड़े भाई शम्भुदत्त जी यह सब झेल न पाए और 1906 में उनका भी निधन हो गया। प्रसाद जी के पूरे परिवार के भरण-पोषण का भार आ पड़ा। उनकी पत्नी का भी स्वर्गवास हो चुका था। 19 वर्ष की अवस्था में यानी 1909 उनका विवाह विंध्यवासिनी देवी के साथ हुआ। 10 वर्ष दांपत्य जीवन बिताने के बाद 1919 में विंध्यवासिनी देवी का निधन हो गया। प्रसाद जी का दूसरा विवाह 1920 में सरस्वती देवी के साथ हुआ। अगले वर्ष प्रसूति काल में पुत्र जन्म के अवसर पर मां-बेटा दोनों चल बसे। इस प्रकार परिवार में मृत्यु आघात को सहते हुए उनमें एक प्रकार का विराग का भाव आ गया था। वे दांपत्य जीवन में पड़ना नहीं चाहते थे। लेकिन भाभी के अनुरोध पर 35 वर्ष की अवस्था में कमला देवी से उनका विवाह हुआ। उन्हीं से एक मात्र संतान रत्नशंकर का जन्म हुआ।


उनकी पढ़ाई-लिखाई गोवर्धन सराय की पाठशाला में शुरु हुई थी। 2-3 वर्षों तक उनकी शिक्षा क्वींस कॉलेज में हुई थी। परंतु 1901 में पिता जी की मृत्यु और व्यवसाय की भारी जिम्मेदारी के कारण उनके अध्ययन की व्यवस्था घर में ही की गई। जब वे रचनात्मक शिखर पर थे और उनकी आयु सैंतालीस वर्ष की थी, तब वे तपेदिक के घातक रोग से पीड़ित हो गए। डॉक्टरों की सलाह पर इलाज के लिए सेनेटोरियम जाने की बजाय वहीं अपनी प्रिय काशी में प्राण त्यागने का निश्चय किया। 14 नवंबर 1937 को काशी में ही उनका देहावसान हो गया।


अपने बाल्यकाल में ही उनका भारतेन्दु जी के यश और ख्याति से परिचय हो गया था। बालक जयशंकर पर उसका प्रभाव पड़ा। शुरु में उनहोंने भारतेन्दु जी के नाटकों को अपना आदर्श माना। दूसरी ओर अंग्रेज़ी के नाटक भी लोगों को प्रभावित कर रहे थे। इस प्रकार प्रसाद जी के सामने एक ओर तो नवयुग-प्रवर्तक भारतेन्दु जी थे तो दूसरी ओर पश्चिमी नाटकों की नवीन अभिनयकला थी। ऐसे संधिकाल में जयशंकर प्रसाद जी के आगमन के साथ ही हिंदी नाट्य साहित्य के एक नए युग का शुभारंभ होता है। उन्होंने भारतीय रस-विधान और पाश्चात्य शील-वैचित्र्य के समन्वय का पथ अपनाया।
(ज़ारी …)

5 टिप्‍पणियां:

  1. नाटक विधा के प्रारंभ के बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए आपका आभार

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  2. जयशंकर प्रसाद जी अपने पारिवारिक जीवन में सुखी नही रहते हुए भी हिंदी साहित्य के प्रति अपने अतर्मन में रचे बसे भावों को रोक नही सके । भारतेंदु जी के नाटकों का प्रभाव इनकी मानसिक संकल्पना को एक नई दशा और दिशा दी । एक ओर भारतेंदु युग के नाटक और दूसरी और तदयुगीन अंग्रेजी नाटकों के बढ़ते वर्चस्व एवं लोकप्रियता के बीच इस महान साहित्यकार ने मध्यम मार्ग का सहारा लेकर अपनी लेखनी को नाट्य-विधा की और अग्रसरित किया। फलस्वरूप, हिंदी साहित्य में एक नूतन युग के सृजन-काल की परिणति हुई । इन्होंने अपने जीवन में घोर निराशा के क्षणों में भी आशा और विश्वाश की किरण को जाज्वल्यमान बनाए रखा । एक प्रबुद्ध साहित्यकार के बारे में प्रस्तुत जानकारी किसी भी साहित्यनुरागी के लिए ज्ञानपरक सिद्ध होगी। अगले पोस्ट का इंतजार रहेगा।
    धन्यवाद।

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  3. आप हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में अन्तर्जाल पर अच्छा काम कर रहे हैं। मैंने तो सुना है कि भारतेंदु जी 1850-1885 तक रहे। फिर इनके तीन साल बाद 1888 में जन्म होना चाहिए प्रसाद का जबकि आप 1890 लिख रहे हैं। तीसरे अनुच्छेद में डाक्टर वाली पँक्ति में पर की जगह अर हो गया है।

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  4. चंदन जी आपने सही ध्यान दिलाया। सुधार कर दिया हूं।

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  5. बहुत बढ़िया जानकारी मिली! आभार!

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