शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

नाट्य साहित्य – द्विवेदी युग


नाट्य साहित्य – द्विवेदी युग

मनोज कुमार

बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशक के पथ-प्रदर्शक, विचारक और साहित्यनेता आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के नाम पर इस काल का नाम ‘द्विवेदी-युग’ पड़ा। इसे ‘जागरण-सुधारकाल’ भी कहा जाता है। इस समय ब्रिटिश दमन-चक्र बहुत बढ़ गया था। जनता में असंतोष और क्षोभ की भावना प्रबल थी। ब्रिटिश शासकों द्वारा लोगों का अर्थिक-शोषण भी चरम पर था। हमारे स्वाधीनता संग्राम के नेताओं द्वारा पूर्ण-स्वराज्य की मांग की जा रही थी। गोखले और तिलक जैसे नेता देश के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व कर रहे थे। इस काल के साहित्यकारों ने न सिर्फ़ देश की दुर्दशा का चित्रण किया बल्कि देशवासियों को आज़ादी की प्राप्ति की प्रेरणा भी दी। राजनीतिक चेतना के साथ-साथ इस काल में भारत की आर्थिक चेतना भी विकसित हुई।

यह काल नाट्यसाहित्य की दृष्टि से सबसे कम समृद्ध है। इस काल में मौलिक नाटकों के सृजन में कमी आई। ऐसा लगता है कि नाटकीय गतिविधि धीरे-धीरे काफ़ी कम हो गए थी। भरतेन्दु जी के समय में जो नाटक मंडलियां थी वे व्यावसायिक तो थीं नहीं, इसलिए समय के साथ वे काल के गाल में समा गईं।

इस युग के प्रसिद्ध रंगकर्मी एवं उच्च कोटि के अभिनेता माधव शुक्ल ने अव्यवसायिक रंगमंच को फिर से जिन्दा करने की कोशिश की। बात 1908 की है जब उन्होंने इलाहाबाद की “रामलीला नाटक मंडली” को झाड़पोछ कर सुरुचिसम्पन्न लोगों की पसंद लायक़ बनाया।  यहां से कई नवजागरण का संदेश देने वाले नाटकों का मंचन हुआ। राष्ट्रीय संस्कृति और सामाजिक चेतना का संस्कार करने वाले नाटकों का रंगमंच पर अभिनय प्रस्तुत किया गया।

राधाकृष्णदास लिखित “राणाप्रताप” और माधव शुक्ल की खुद का लिखा “महाभारत” नाटकों के मंचन ने तो धूम ही मचा दी। इससे रंगमंच की दुनिया में एक नई हलचल मची। इससे प्रोत्साहित होकर कई रंगनाटक लिखे गए। माखनलाल चतुर्वेदी कृत “कृष्णार्जुन युद्ध” (1918), बदरीनाथ भट्ट कृत “दुर्गावती”, “कुरुवनदहन” और “वेनचरित”, बलदेव प्रसाद मिश्र कृत “प्रभास मिलन” इस समय के लिखे हुए बहुत ही प्रभावशाली नाटक थे।

इस युग के पौराणिक नाटक में ..
१.    कृष्ण चरित से संबंधित नाटक
·        राधाचरण गोस्वामी कृत ‘श्रीदामा (1904), शिवनंदन सहाय कृत ‘सुदामा’ (1907), बनवारीलाल कृत ‘कृष्णकथा’ और ‘कंसवध’ (1909),
२.    रामचरित संबंधी नाटक
·        रामनारायण मिश्र कृत ‘जनक बाड़ा’ (1906), गंगाप्रसाद कृत ‘रामाभिषेक’ (1910), गिरधरलाल कृत ‘राम वनयात्रा’ (1910), नारायण सहाय कृत ‘रामलीला’ (1911), रामगुलामलाल कृत ‘धनुषयज्ञ लीला’ (1912)
३.    पौराणिक पात्रों को लेकर लिखे गए नाटक
·        महावीर सिंह कृत ‘नल-दमयंती’ (1905), गौरचरण गोस्वामी कृत ‘अभिमन्यु बध’ (1906), सुदर्शनाचार्य कृत ‘अनर्घ नलचरित’ (1906), बांकेबिहारी लाल कृत ‘सावित्री नाटिका’ (1908), बालकृष्ण भट्ट कृत ‘वेणु संहार’ (1909), लक्ष्मी प्रसाद कृत ‘उर्वशी’ (1910), हनुमंत सिंह कृत ‘सती-चरित्र’ (1910), शिवनंदन मिश्र कृत ‘शकुंतला’ (1911), जयशंकर प्रसाद कृत ‘करुणालय’ (1912), बदरीनाथ भट्ट कृत ‘कुरुवन-दहन’ (1915), माधव धुक्ल कृत ‘महाभारत पूर्वार्द्ध’ (1916), हरिदास माणिक कृत ‘पाण्डव-प्रताप’ (1917), और माखनलाल चतुर्वेदी कृत ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ (1918)।

इन नाटकों में चरित्रों के माध्यम से जनता को उपदेश देने का प्रयास किया गया है। नाटक कला का उपयुक्त विकास इनसे नहीं हुआ। अभिनय तत्व भी गौण ही है।

४.    ऐतिहासिक नाटक में गंगाप्रसाद गुप्त कृत ‘वीर जयमाल’ (1903), वृंदावनलाल वर्मा कृत ‘सेनापति उदल’ (1909), बदरीनाथ भट्ट कृत ‘चंद्रगुप्त’ (1915), कृष्णप्रकाश सिंह कृत ‘पन्ना’ (1915), हरिदास माणिक कृत ‘संयोगिताहरण’ (1915), जयशंकर प्रसाद कृत ‘राज्य श्री’ (1915) और परमेष्ठीदास जैन कृत ‘वीर चूड़ावत सरदार’ (1918)।

प्रसाद जी के नाटक को छोड़कर किसी में इतिहास का निर्माण नहीं हो सका।

५.    सामाजिक नाटक में प्रतापनारायण मिश्र कृत ‘भारत दुर्दशा’ (1902), भगवती प्रसाद कृत ‘वृद्ध-विवाह’ (1905), जीवानंद शर्मा कृत ‘भारत विजय’ (1906), कृष्णानंद जोशी कृत ‘उन्नति कहां से होगी’ (1915), मिश्र बंधु कृत ‘नेत्रोन्मीलन’ (1915)।

इन नाटकों में सामाजिक विकृतियों को उभारने की कोशिश की गई है। इनका लक्ष्य समाज सुधार है। किन्तु नाट्यकला की दृष्टि से इनका महत्व अधिक नहीं है।

६.    इस युग में रोमांचकारी नाटक भी लिखे गए। अलौकिक घटनाओं को केन्द्र में रखकर ये नाटक पारसी रंगमंच की शैली में लिखे गए। इसकी विषयवस्तु फारसी प्रेम कथाओं पर आधारित होती थी। कुछ रोमांचकारी नाटक पौराणिक कथाओं पर भी आधारित थे। इन नाटकों की शुरुआत “कोरस” से होती थी। मुख्य कथा के समानान्तर एक प्रहसन भी चलता रहता था। यह दर्शकों को हंसाने के लिए होता था। इन नाटकों की भाषा उर्दू मिश्रित हुआ करती थी। बाद के दिनों में साधारण बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग शुरु हो गया। इस श्रेणी के नाटकों की रचना में मुहम्मद मियां “रौनक”, सैयद मेंहदी हसन “अहसान”, नारायण प्रसाद ‘बेताब’, आगा मोहम्मद ‘हश्र’ और राधेश्याम कथावचक ने प्रमुख भूमिका निभाई।

७.    इस युग में पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, रोमांचकारी, आदि विषयों के अलावा प्रहसन नाटक भी लिखे गए। बद्री नाथ भाट्ट कृत ‘चुंगी की उम्मीदवारी’ (1912), गंगाप्रसाद श्रीवास्तव कृत ‘उलटफेर’ (1918) और ‘नोंक झोंक’ (1918)

८.    अनूदित नाटक की श्रीणी में संस्कृत से सदानंद अवस्थी ने ‘नागानंद’ (1906), लाला सीताराम ने ‘मृच्छकटिक’ (1913), कविरत्न सत्यनारायण ने ‘उत्तर रामचरित’ किया। अंग्रेज़ी से शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद लाला सीताराम और चतुर्भुज औदीच्य ने किया। बंगला से ब्रजनंदन सहाय ने किया।

इस काल के नाटकों की विवेचना करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं, “इन मौलिक रूपकों की सूची देखने से यह लक्षित हो जाता है कि नाटक की कथावस्तु के लिये लोगों का ध्यान अधिकतर ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों की ओर ही गया है। वर्तमान सामाजिक और पारिवारिक जीवन के विविध उलझे हुए पक्षों का सूक्षमता के साथ निरीक्षण करके उनके मार्मिक या अनूठे चित्र खड़ा करनेवाली उद्भावना उनमें नहीं पाई जाती।”

चूंकि इस युग में भारतेन्दु से आगे बढ़कर शिल्प और संवेदना के स्तर पर कोई नया प्रयोग तो नहीं ही हुआ, इसलिए भारतेन्दु जी ने हिंदी रंगमंच की स्थापना का जो काम शुरु किया था, वह आगे न बढ़ सका। बल्कि यो कहें कि इस युग में सृजन की दृष्टि से ह्रास ही हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि जनता की रुचि व्यावसायिक रंगमंचीय नाटकों की तरफ़ मुड़ गई।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं, “इन मौलिक रूपकों की सूची देखने से यह लक्षित हो जाता है कि नाटक की कथावस्तु के लिये लोगों का ध्यान अधिकतर ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों की ओर ही गया है। वर्तमान सामाजिक और पारिवारिक जीवन के विविध उलझे हुए पक्षों का सूक्षमता के साथ निरीक्षण करके उनके मार्मिक या अनूठे चित्र खड़ा करनेवाली उद्भावना उनमें नहीं पाई जाती।”

    मनोज कुमार जी, इस संबंध में मैंने आपके द्वारा प्रस्तुत पूर्ववर्ती नाट्य-विधा पर इन विचारों को भी स्थान दिया है। समय और तदयुगीन विसंगतियां एवं व्यावसाय प्रधान न होने के कारण यह विधा शनै-शनै विलुप्त होती चली गयी। इनके परवर्ती नाट्यकारों ने पुन: इसे एक नया दिशा और दशा प्रदान करने की कोशिश करते रहे परंतु जनमानस के बीच इसे साफल्य-मंडित करने में असमर्थ रहे। अन्य लोगों के साथ मोहन राकेश द्वारा पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थितियो की पृष्ठभूमि में रचित नाटक 'आधे अधूरे','आषाढ़ का एक दिन' एवं 'लहरों के राजहंस' अपनी समग्रता मे कुछ हद तक मानवीय संवेदना को आंदोलित करने में सफल रहे। अंत मे, मेरी अपनी मान्यता है कि रंगकर्मियों की इस विधा के प्रति उदासीनता, नाट्य प्रेमियों की अरूचि के साथ-साथ रंगशालाओं के सूनापन को देखने से प्रतीत होता है कि एक लम्बे सफर की यात्रा तय करने के बाद यह विधा अब विलुप्ति की आखिरी छोर की ओर बढ़ती हुई प्रतीत हो रही है। काश!ऐसा नही होता। एक अच्छे विधा से परिचित कराता आपका यह पोस्ट बहुत ही ज्ञानपरक है।
    धन्यवाद।

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  2. यह श्रृंखला इतनी रोचक और ज्ञानवर्धक है कि एक लंबे समय तक नाटक से जुड़े रहने के बावजूद भी इतने सिलसिलेवार तौर पर एक विधा के रूप में इसको समझने का अवसर नहीं मिला.
    मनोज जी आभार आपका!!

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  3. नटी साहित्य पर कभी भी इतना कुछ नहीं पढ़ा था .. शोधपरक जानकारी के लिए आभार

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