मंगलवार, 16 अगस्त 2011

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

राम धारी सिंह 'दिनकर'

सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

 

जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,

जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,

जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे

तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

 

जनता? हां, लंबी-बडी जीभ की वही कसम,

"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"

"सो ठीक, मगर, आखिर इस पर जनमत क्या है?"

'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"

 

मानो, जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,

जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;

अथवा कोई दुधमुंही जिसे बहलाने के

जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

 

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,

जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

 

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,

सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,

जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?

वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

 

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार

बीता; गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;

यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय

चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

 

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,

तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तैयार करो

अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,

तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

 

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,

मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?

देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,

देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

 

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,

धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;

दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

                                       

20 टिप्‍पणियां:

  1. इससे तो दिनकर की 'भारत का रेशमी नगर' कविता याद आती है।

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  2. बहुत भावपूर्ण रचना |
    आशा

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  3. दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
    सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
    ekdam aaj ki baat hai jaise......

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  4. मनोज जी!
    दिनकर जी की यह रचना २६ जनवरी १९५० की है.. प्रथम गणतंत्र दिवस पर रची गयी!! आज भी प्रासंगिक है और आज भी इसको पढकर नसों में रक्त संचार बढ़ जाता है!!

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  5. दिनकर जी की बहुत ओज पूर्ण रचना पढवाने का आभार ... आज भी यह प्रासंगिक है ...

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  6. दिनकर की कालजयी रचना आज अपना अर्थ व्याख्यायित कर रही है.सुन्दर प्रस्तुति

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  7. दिनकर की कालजयी रचना आज अपना अर्थ व्याख्यायित कर रही है.सुन्दर प्रस्तुति

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  8. टिप्पणी में देखिए मरे चार दोहे-
    अपना भारतवर्ष है, गाँधी जी का देश।
    सत्य-अहिंसा का यहाँ, बना रहे परिवेश।१।

    शासन में जब बढ़ गया, ज्यादा भ्रष्टाचार।
    तब अन्ना ने ले लिया, गाँधी का अवतार।२।

    गांधी टोपी देखकर, सहम गये सरदार।
    अन्ना के आगे झुकी, अभिमानी सरकार।३।

    साम-दाम औ’ दण्ड की, हुई करारी हार।
    सत्याग्रह के सामने, डाल दिये हथियार।४।

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  9. रामधारी सिंह की कविता सिंहासन खाली करो कि जनता अती है, अच्छी लगी ।
    धन्यवाद।

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  10. दिनकर जी की यह कविता न केवल आज बल्कि इसकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी।

    सादर

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  11. रचना कालजयी परन्तु आज भी प्रासंगिक है यही हो रहा है भारत में.

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  12. इस बेहतरीन रचना प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

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  13. नमस्कार....
    बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें
    मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में पलकें बिछाए........
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    नीलकमल वैष्णव "अनिश"

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  14. बाहर ओज़स्वी रचना ... आज के हालात का यथार्थ चित्रण ...

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  15. बहुत ही सामयिक रचना...आज के दौर में पूर्ण रूप से प्रासंगिक है यह.पढवाने का आभार.

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  16. दिनकर की पंक्तियां राजतंत्र के घमंड़ को चूर करती हैं... वहीं प्रजा की ताकत का गुणगान करती हैं...आजादी के समय इस कवीता ने प्रजातंत्र की स्थापना की... वहीं सत्ता के मद में चूर राजनेता के खिलाफ जेपी ने संपूर्ण क्रांती के उद्घोष किया जिसका मुख्य गीत दिनकर की ये कवीता थी...

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