शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

रह गये

अज्ञेय की कविता-7
रह गये

सब
अपनी-अपनी
कह गये :
हम
रह गये।

ज़बान है
पर कहाँ है बोल
जो तह को पा सके ?
आवाज़ है
पर कहाँ है बल
जो सही जगह पहुँचा सके ?
दिल है
पर कहाँ है जिगरा
जो सच के मार खा सके ?

यों सब
जो आये
कुछ न कुछ
कह गये :
हम
अचकचाये
रह गये।

4 टिप्‍पणियां:

  1. दिल है
    पर कहाँ है जिगरा
    जो सच के मार खा सके ?

    बहुत अच्छी प्रस्तुति ...

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  2. यों सब
    जो आये
    कुछ न कुछ
    कह गये :
    हम
    अचकचाये
    रह गये।

    shukriya is kavita ko ham tak pahuchane ke liye.

    उत्तर देंहटाएं
  3. यों सब
    जो आये
    कुछ न कुछ
    कह गये :
    हम
    अचकचाये
    रह गये।

    अज्ञेय की रचनात्मकता हमेशा ही प्रभावित करती है ....और उनका किसी बात को कहने का अंदाज बहुत ही निराला है ...इस कविता में भी वह पूरी तरह से सामने आ रहा है ...आपका आभार

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