सोमवार, 8 अगस्त 2011

यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे तबे एकला चलो रे

आज कविगुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर की पुण्य तिथि हैimages (4)

आज कविगुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर की पुण्य तिथि है। पश्चिम बंगाल में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कविगुरु की कविताएं उनके मानस का प्रतिबिम्ब हैं। वे एक दार्शनिक थे। बंग्ला साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर व महान विभूति विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर, एक व्यक्ति का नहीं एक युग का नाम है। आचरण की पवित्रता और दिव्य संदेश के सहारे उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को सच्ची राह दिखाई।

मुझे उनका गीत ‘यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे तबे एकला चलो रे।’ हमेशा से प्रेरित करती रही है। इस गीत में सार्थक आत्मविश्वास भरे जीवन का दर्शन हुआ है। हमें किसी के साथ की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हम न तो सभी को प्रसन्न रख पाएंगे और न ही सभी को अपने साथ चलने के लिए प्रेरित कर पाएंगे। इस आस में हम आगे बढ़ने के वजाए रुके रहें तो यह जीवन की सार्थकता की आहुति देने के समान होगा और हमारी मानसिक निर्बलता का परिचायक ही होगा।

इसका गीत का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि हम सबका विरोध करें। न ही यह हमें प्रेरित करता है कि हम सबके विपरीत चलें। इसका अर्थ तो सिर्फ़ यह है कि हम अपनी अंतरात्मा की आवाज़ का अनुपालन करें - चाहे इसमें हमारा कोई साथ दे या ना दे। मैं देखता हूं कि लोग कहते हैं कि लोग सुधार तो चाहते हैं पर कोई साथ नहीं देता तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने निर्धारित मार्ग पर चलते रहें। इतिहास गवाह है कि ऐसे मनुष्य ही मानवता के पथ-प्रदर्शक होते हैं जो एकला चलने में विश्वास रखते हैं। कई बार ऐसा हुआ है कि सभी उन्ही के पदों का अनुसरण करने लगते हैं।

যদি তোর ডাক শুনে কেউ না আসে

তবে একলা চলো রে|

একলা চলো, একলা চলো, একলা চলো রে||

যদি কেউ কথা না কয়, ওরে ওরে ও অভাগা,

যদি সবাই থাকে মুখ ফিরাযে সবাই করে ভয় –

তবে পরান খুলে

ও তুই মুখ ফুটে তোর মনের কথা একলা বলো রে||

যদি সবাই ফিরে যায়, ওরে ওরে ও অভাগা,

যদি গহন পথে যাবার কালে কেউ ফিরে না যায় –

তবে পথের কাঁটা

ও, তুই রক্ত মাখা চরণ তলে একলা দলো রে||

যদি আলো না ধরে, ওরে ওরে ও অভাগা,

যহি ঝড় বাদলে আঁধার রাতে দুয়ার দেয় ধরে –

তবে বজ্রানলে

আপন বুকের পাঁজর জ্বালিয়ে নিয়ে একলা জ্বলো রে||

यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!

यदि केऊ कथा ना कोय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
यदि सबाई थाके मुख फिराय, सबाई करे भय-
तबे परान खुले
ओ, तुई मुख फूटे तोर मनेर कथा एकला बोलो रे!
यदि सबाई फिरे जाय, ओरे, ओरे, ओ अभागा,
यदि गहन पथे जाबार काले केऊ फिरे न जाय-
तबे पथेर काँटा
ओ, तुई रक्तमाला चरन तले एकला दलो रे!
यदि आलो ना घरे, ओरे, ओरे, ओ अभागा-
यदि झड़ बादले आधार राते दुयार देय धरे-
तबे वज्रानले

आपुन बुकेर पांजर जालियेनिये एकला जलो रे!

**** जब वे तुम्हारी पुकार ना सुनें, तो एकला चलो! जब कोई तुमसे कुछ ना कहे, अरे अभागे, जब सब तुमसे मुंह फेर लें सब भयभीत हों - तब अपने अन्दर झांको अरे अपने मुंह से अपनी बात एकला बोलो। जब सब दूर चले जाएँ, अरे अभागे, जब कंटीले पथ पर कोई तुम्हारा साथ ना दे -- तब अपने पथ पर काँटों को अकेले ही पद-दलित करो। जब कोई प्रकाश न करे, अरे अभागे, जब रात काली और तूफानी हो -- तब अपने ह्रदय की पीड़ा के आवेश में अकेले जलो। ****

 

कविगुरु के चरणों में शत-शत नमन!

10 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल ऐसा लगता है कि राजभाषा के पथ पर अकेला ही चलना होगा। गुरुवर के संदेश का अनुसरण ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। उनकी दार्शनिक कविता का मूल बाङ्गला पढ़ने के लिए मिला। आभार।

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  2. बहुत सारगर्भित ... गुरुदेव रविन्द्र ठाकुर को शत शत नमन

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  3. 1964 मे छह माह ही बांग्ला पढे थे उसके बाद आज आपने पढ़वा दिया। यह गीत और इसके भाव दोनों ही अच्छे हैं।

    कविवर रवीन्द्रनाथ जी की पुण्यतिथि पर उनका स्मरण स्तुत्य है।

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  4. गुरुदेव रविन्द्र ठाकुर को शत-शत नमन....

    बहुत सशक्त प्रस्तुति।

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  5. नमन उस महाकवि को, जिसकी रचनाएँ अपने आप में एक संसकृति हैं.. मुझे इस बात का गर्व है कि मैं कभी उस संस्कृति का हिस्सा रहा हूँ!!

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  6. दुनिया की अधिकतर मौलिक उपलब्धियां वैयक्तिक ही हैं।

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  7. यही सच और आज की पुकार है...अपेक्षा रखेंगे तो चोट खायेंगे सो एकला चलो !
    शुभकामनायें !

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  8. एकला चोलो रे ...आज अगर हम आदर्शों की दुहाई दें तो साथ देने वाले मुश्किल से मिलेंगे ..इसलिए भी आज के परिपेक्ष में भी सारगर्भित है यह रचना ...!!
    गुरुदेव जैसी महानात्मा को मेरा नमन...!!

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  9. श्री मनोज कुमार जी, आपने कविगुरू की रचना से प्रभावित होकर लिखा है कि आप भी उनकी कविता ' यदि तोमार डाक शुने केउ न आसे तबे एकला चलो रे " से बहुत कुछ सीखा है। कुछ सीखने और स्वयं को जीवन-पथ पर किसी का अवलंबन लिए बिना निर्बाध गति से अग्रसरित होने के लिए यह हमें दिशा देती सी प्रतीत होती है। यह कविता हमें एक गूढ संदेश दे जाती है। गुरूदेव को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। आज मैं भी गुरूदेव की एक कविता पोस्ट कर रहा हूँ ,समय इजाजत दे तो इसे पढ़ने की कोशिश कीजिएगा। बहुत सुंदर लगा।धन्यवाद।

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  10. टैगोर को तो मैं पसन्द नहीं करता अधिक लेकिन उनकी तबे एकला चलो रे तो बहुत पसन्द है!

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