बुधवार, 18 अगस्त 2010

कविता के नए सोपान (भाग-1)

कविता के नए सोपान (भाग-1)

नयी कविता के कवियों-अलोचकों ने काव्य को नए ढ़ंग से परिभाषित किया है। प्रयोगवाद के साथ-साथ नई कविता पर बहस चली।  इस बहस में यह प्रश्‍न भी सामने आया कि “नया” क्या है? साथ ही यह भी विचारणीय रहा कि कविता क्या है?

आधुनिक हिन्दी कविता में डाक्टर जगदीश गुप्त का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका मानना था कि,

“ये दोनों प्रश्‍न परस्‍पर सम्‍बद्ध और एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं। क्‍योंकि कविता में नवीनता की उत्‍पत्ति वस्‍तुतः सच्‍ची कविता लिखने की आकांक्षा से उत्‍पन्‍न होती है।”

बात सही भी है। कवि जो भी कहता है उसमें यदि सृजनात्‍मकता और संवेदनीयता नहीं हो, तो उसे कविता नहीं कहा जा सकता। “नई कविता स्‍वरूप और समस्‍याएं” पुस्‍तक में जगदीश गुप्‍त ने कहा कि

“ कविता सहज आंतरिक अनुशासन से युक्‍त अनुभूति जन्‍य सघन-लयात्‍मक शब्‍दार्थ है जिसमें सह-अनुभूति उत्‍पन्न करने की यथेष्‍ट क्षमता निहित रहती है।”

उन्‍होंने “यथेष्‍ट” शब्‍द का प्रयोग किया है। यथेष्‍ट शब्‍द कवि और पाठक दोनों को समाहित किए है। इसका अर्थ यह हुआ कि कविता के विषय में कवि का निर्णय अंतिम निर्णय नहीं है। पाठक या श्रोता की मान्‍यता अनिवार्य है।

पर इस नई कविता को परिभाषित करते समय जगदीशगुप्‍त ने सृजनात्‍मकता शब्‍द का प्रयोग नहीं किया है। इस कारण से कुछ विद्वानों ने इस परिभाषा पर आपत्ति भी उठाई है। जाने माने आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने, “कविता के नए प्रतिमान” में “कविता क्‍या है” निबंध लिखा है। इस निबंध में उन्‍होंने कहा,

“डॉ. जगदीशगुप्‍त अपनी काव्‍य-परिभाषा में वह तत्‍व भूल गए जिसे नई कविता ने हिंदी काव्‍य-परम्परा से जोड़ा है। इसलिए अनुभूति तो उन्‍हें याद रह गई लेकिन सृजनात्‍मकता भूल गए।

“जगदीशगुप्‍त की परिभाषा की यह सबसे बड़ी सीमा है। यह परिभाषा छायावादी अनुभूति और नई कविता की नई अनुभूति में फर्क करके नहीं चलती।”

“सह-अनुभूति” में विचार-भंगिमा का नयापन है। “सह अनुभूति” , “रसानुभूति” का पर्याय नहीं है। यह नवीन काव्‍यानुभूति का पर्याय है। अतः हम कह सकते हैं कि सह-अनुभूति का प्रश्‍न रसानुभूति के विरोध में उठाया गया था।

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