मंगलवार, 17 अगस्त 2010

काव्‍य के मूल में मानवीय संवेदना की सक्रियता है।

"काव्‍य के मूल में मानवीय संवेदना की सक्रियता है।”

नई कविता के कवियों ने काव्‍य को नए ढंग से परिभाषित किया। उन्होंने रचनाओं में संवेदनशीलता पर उन्‍होंने विचार किया। इन आलोचकों कवियों का कहना था कि काव्‍य के मूल में मानवीय संवेदना ही सक्रिय रहती है। जिस तरह से हमारा जीवन गतिशील और परिवर्तनशील है, उसी तरह मानवीय संवेदना भी है। हमारे आसपास जो कुछ है, जो घटित हो रहा है उसका प्रभाव काव्‍य पर पड़ना स्‍वाभाविक है। परिवेश की नवीनता, उसका बदलाव, काव्‍य चिंतन के परिप्रेक्ष्‍य को बदल देती है।

कवि और चिंतक सच्चिदानंद हीरानंद वात्‍सयायन अज्ञेय जिन्‍होंने दूसरा सप्‍तक और सर्जना और संदर्भ की रचना की, का मानना था कि हमारे रामात्‍मक संबंधों में भी बदलाव आया है। इसके फलस्‍वरूप पुराने संस्‍कारगत रागात्‍मक संबंधो में बदलाव परिलक्षित है।

रघुवीर सहाय के काव्‍य संकलन सीढि़यों पर धूप में की भूमिका में अज्ञेय ने कहा है - “काव्‍य सबसे पहले शब्‍द है। और सबसे अंत में भी यही बात बच जाती है कि काव्‍य शब्‍द है।"

यह एक महत्‍वूपर्ण परिभाषा है। सारे कविधर्म इसी परिभाषा से निःसृत होते हैं। शब्‍द का ज्ञान और इसकी अर्थवत्ता की सही पकड़ से ही एक व्यक्ति रचनाकार से रचयिता बनता है। अज्ञेय का मानना था कि ध्‍वनि, लय छंद आदि के सभी प्रश्‍न इसी में से निकलते हैं और इसी में विलय होते हैं।

अज्ञेय तो यहां तक कहते हैं कि “सारे सामाजिक संदर्भ भी यहीं से निकलते है। इसी में युग-सम्पृक्ति का और कृतिकार के सामाजिक उत्‍तरदायित्‍व का हल मिलता है या मिल सकता है।" इस प्रकार जब हम काव्‍य लक्षण परम्‍परा की चर्चाओं पर ध्‍यान केंद्रित करते हैं तो पाते हैं कि या तो काव्‍यार्थ शब्‍द में है या अर्थ में है या फिर दोनों में है। इस बहस में एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि अधिकांश आचार्यों ने शब्‍द पंरपरा का ही समर्थन किया है। दूसरी प्रमुख बात जो सामने आती है वह यह है कि अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, रस जैसे पुराने प्रतिमान, जिस तरह से पहले कारगर थे आज नहीं रहे हैं।

15 टिप्‍पणियां:

  1. Sare jyeshth diggajon se kshama mang kar ye kahane ka lobh nahee sanwar patee ki,
    Kavya shabd to hai hee par usase adhik bhee bahut kuch hai jo use gadya se ,lekah se kahanee se alag karta hai usme ek ogh ek gati hotee hai aur hote hain bhaw jo samwedana ke antargat hee aate hain. alankar, aur chand aaj bhee chamatkrut hee karate hain.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज के कक्षा ने नई कविता को जानने के लिए विअचारिक पृष्ठ भूमि दी हैं.. यहाँ से नई कविता को समझा जा सकता है.. संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित पोस्ट..

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन पड़ताल..सारगर्भित लेख..बधाई.

    'डाकिया डाक लाया' पर भी आयें तो ख़ुशी होगी.

    उत्तर देंहटाएं
  4. "शब्‍द का ज्ञान और इसकी अर्थवत्ता की सही पकड़ से ही एक व्यक्ति रचनाकार से रचयिता बनता है।"

    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सार्थक प्रस्तुति ...यह सारे लेख संग्रहणीय हैं ..

    उत्तर देंहटाएं
  6. काफ़ी ज्ञानवर्धक आलेख्……………काव्य को जिस तरह आप परिभाषित कर रहे हैं वो काबिल-ए-तारीफ़ है……………वक्त के साथ आते बद्लाव हर कवि की अपनी अपनी शैली सबका बेहद गहराई से अध्ययन करके जिस तरह आप बता रहे हैं उसके लिये हम कृतज्ञ हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. यद्यपि काव्य में भाव प्रधान होता है, जैसा संभवतः आशा जोगलेकर कहना चाहती हैं,किन्तु शब्द के सामर्थ्य की भी अपनी महिमा है. किसी स्थान पर कोई शब्द विशेष जो प्रभाव उत्पन्न करता है. उसका समानार्थी दूसरा शब्द नहीं कर सकता |

    उत्तर देंहटाएं
  8. Aapke blog par aane se sahitye ke baare men kaafi kuchh jaane ko mil raha hai.

    उत्तर देंहटाएं

आप अपने सुझाव और मूल्यांकन से हमारा मार्गदर्शन करें