शुक्रवार, 15 जून 2012

दोहावली --- भाग - 16 / संत कबीर



जन्म  --- 1398

निधन ---  1518
कबीरा  संगति साधु की, जौ की भूसी खाय
खीर खाँड़ भोजन मिले, ताकर संग जाय 151

एक ते जान अनन्त, अन्य एक हो आय
एक से परचे भया, एक बाहे समाय 152

कबीरा गरब कीजिए, कबहूँ हँसिये कोय
अजहूँ नाव समुद्र में, ना जाने का होय 153

कबीरा कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय
दुख बासे भागा फिरै, सुख में रहै समाय 154

कबीरा संगति साधु की, जित प्रीत कीजै जाय
दुर्गति दूर वहावति, देवी सुमति बनाय 155

कबीरा संगत साधु की, निष्फल कभी होय
होमी चन्दन बासना, नीम कहसी कोय 156

को छूटौ इहिं जाल परि, कत फुरंग अकुलाय
ज्यों-ज्यों सुरझि भजौ चहै, त्यों-त्यों उरझत जाय 157

कबीरा सोया क्या करे, उठि भजे भगवान
जम जब घर ले जाएँगे, पड़ा रहेगा म्यान 158

काह भरोसा देह का, बिनस जात छिन मारहिं
साँस-साँस सुमिरन करो, और यतन कछु नाहिं 159

काल करे से आज कर, सबहि सात तुव साथ
काल काल तू क्या करे काल काल के हाथ 160

12 टिप्‍पणियां:

  1. काल काल तू क्या करे काल काल के हाथ... अद्भुत.....
    संत कबीर को नमन
    सादर आभार।

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  2. कबीर कह रहे हैं कि सद्संगति से कलह ही नहीं,कल्पना भी दूर होती है। यह एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष है क्योंकि इसमें कलह भूत का और कल्पना भविष्य का प्रतिनिधित्व कर रही है।।

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  3. काल करे से आज कर, सबहि सात तुव साथ ।
    काल काल तू क्या करे काल काल के हाथ ……………बहुत सुन्दर दोहावलि चल रही है।

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  4. संगत पर आधारित दोहे ..अच्छी रही पोस्ट.

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  5. काह भरोसा देह का, बिनस जात छिन मारहिं ।
    साँस-साँस सुमिरन करो, और यतन कछु नाहिं ॥ 159 ॥

    कबीर की वाणी चेताती है, आभार !

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  6. भाई साहब ज़िन्दगी के दोराहे पर टिपण्णी खुली नहीं .एक ऐसी आप बीती सत्य कथा आपने पढवा दी जो अन्दर के द्वंद्व को रूपायित करती है .कर्तव्य बोध को मुखर करती है और ज़मीर को नै दिशा .आदमी सदैव ही अपनी गलतियां सुधार सकता है ,अपना कल भी .बढ़िया कसावदार कथा के लिए बधाई .

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  7. दर्शन रिश्ता है कबीर ग्रंथावली से बस कोई समोने वाला होय .

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  8. बहुत बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  9. कबीर के दोहों की सुंदर प्रस्तुति हेतु आभार .....

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