शुक्रवार, 1 जून 2012

दोहावली ....भाग - 14 / संत कबीर


जन्म  --- 1398

निधन ---  1518



कांचे भाडें से रहे, ज्यों कुम्हार का देह

भीतर से रक्षा करे, बाहर चोई देह 131


साँई ते सब होते है, बन्दे से कुछ नाहिं

राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं 132


केतन दिन ऐसे गए, अन रुचे का नेह

अवसर बोवे उपजे नहीं, जो नहीं बरसे मेह 133


एक ते अनन्त अन्त एक हो जाय

एक से परचे भया, एक मोह समाय 134


साधु सती और सूरमा, इनकी बात अगाध

आशा छोड़े देह की, तन की अनथक साध 135


हरि संगत शीतल भया, मिटी मोह की ताप

निशिवासर सुख निधि, लहा अन्न प्रगटा आप 136


आशा का ईंधन करो, मनशा करो बभूत

जोगी फेरी यों फिरो, तब वन आवे सूत 137


आग जो लगी समुद्र में, धुआँ ना प्रकट होय

सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय 138


अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट

चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पठन को फूट 139


अपने-अपने साख की, सब ही लीनी भान

हरि की बात दुरन्तरा, पूरी ना कहूँ जान 140



8 टिप्‍पणियां:

  1. आग जो लगी समुद्र में, धुआँ ना प्रकट होय ।

    सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय
    सही बात ..

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  2. साँई ते सब होते है, बन्दे से कुछ नाहिं ।

    राई से पर्वत करे, पर्वत राई माहिं ॥ 132 ॥

    bahut saarthak prayas...
    abhaar sangeeta di.

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  3. कबीर के हर दोहे कुछ न कुछ सीख देते हैं । हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम उनके दोहों को केवल पढ़ते हैं लेकिन जीवन में उन पर अमल नही करते हैं । आप इस पोस्ट की निरंतरता को बनाएं रखें । धन्यवाद ।

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  4. इनमें से कई ऐसे दोहे हैं जिन्हें पहले कभी सुना नहीं था। प्रेम सागर सिंह की बातों से सहमति है कि आप इस पोस्ट की निरंतरता को बनाएं रखें ।

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