शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

दोहावली ...भाग -21 / संत कबीर


जन्म  --- 1398

निधन ---  1518

ते दिन गये अकारथी, संगत भई संत
प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत 201

तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर होय
माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय 202

तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय
सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय 203

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे नसूर
तब लग जीव जग कर्मवश, जब लग ज्ञान ना पूर 204

दुर्लभ मानुष जनम है, देह बारम्बार
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि लागे डार 205

दस द्वारे का पींजरा, तामें पंछी मौन
रहे को अचरज भयौ, गये अचम्भा कौन 206

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सीचें सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय 207

न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल जाय
मीन सदा जल में रहै, धोये बास जाय 208

पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय
एक पहर भी नाम बीन, मुक्ति कैसे होय 209

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया कोय
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय 210


9 टिप्‍पणियां:

  1. कबीर जी के दोहे प्रस्तुत कर आप एक नेक कार्य कर रहे हैं .....प्रस्तुत हर दोहे में जीवन का सार छुपा है ...!

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  2. न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय ।
    मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय ॥ sahi kitni satik bat.tere bin pr aapka intjaar hai...

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  3. ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत ।
    प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ॥ 201

    सचमुच सत्संग के बिना जीवन अधूरा है...

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  4. पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
    ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय ॥

    कबीर की बाणी अचूक है,शाश्वत है,सत्य है,गंभीर है...

    इस प्रस्तुति के लिए आभार!!

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  5. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में कोमल निशाद
    और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित
    है, पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी
    किया है, जिससे इसमें राग
    बागेश्री भी झलकता है...

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.
    .. वेद जी को अपने संगीत कि
    प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से मिलती
    है...
    Stop by my weblog - फिल्म

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