गुरुवार, 5 जुलाई 2012

समर शेष है

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nसभी पाठकों  को   अनामिका का सादर नमन  !  साथियो अब हम दिनकर  जी के व्यक्तित्व  और कृतित्व पर आधारित इस साहित्यिक  शृंखला   के  अंतिम पड़ाव पर हैं  और इस अंक में देखते हैं उनकी पुस्तक 'शुद्ध कविता की खोज' पर उनके स्वयं के विचार ....




Dinkarदिनकरजी जीवन दर्पण -15

लीजिये चार पंक्तियाँ दिनकर जी के ही शब्दों में....
दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा की
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं,
सजग संसार तू निज को संभाले,
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं.
आज के भारत की मनोव्यथा दिनकर जी के काव्य में अच्छी तरह प्रकट है. दिनकरजी ने कविताओं  के सिवा गद्य के भी कई हजार पृष्ठ लिखे हैं, जिनमे उनका अध्ययन बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रकट हुआ है. 'संस्कृति के चार अध्याय' के समान ही उनके अन्य निबंध ग्रन्थ भी विचारोत्तेजक और पठनीय हैं. अर्धनारीश्वर, रेती के फूल, उजली आग, वेणुवन और वट-पीपल, ये ऐसे ग्रन्थ नहीं हैं जो रोज लिखे जाते हों. इन ग्रंथों में दिनकर जी का जो रूप प्रकट हुआ है वह अंतर्राष्ट्रीय धरातल के  चिन्तक का रूप है. विशेषतः, 'धर्म, नैतिकता और विज्ञान  के तीनों के तीनों निबंध अद्भुत, गंभीर और विचारोत्तेजक हैं. यदि दिनकर जी कविता की एक पंक्ति भी न लिखते, तो भी एक गद्यकार के रूप में हिंदी साहित्य जगत में अमर होते. वे बराबर कुछ न कुछ गंभीर अध्ययन करते थे और उसका फल पाठकों के सामने पेश करते थे। 'शुद्ध कविता की खोज' उनकी वह पुस्तक है जिससे चिन्तक के रूप में उनकी ख्याति में चार चाँद  लगे. हांलाकि उनकी सभी खोजों तथा मान्यताओं के साथ सहमत होना संभव नहीं है. उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम ही 'शुद्ध कविता की खोज' रखा है, जिससे यह सूचित होता है कि अभी खोज जारी थी, कोई मान्यता रूढ़िग्रस्त नहीं हो पाई और उनके लिए रूढ़ि यहाँ तक कि आत्मसृष्ट  रूढ़ि  क्या करती जब वे भावना में सब भूल जाते.
थोड़े में कविता के सम्बन्ध में उनका विचार क्या है, उसकी भूमिका के रूप में वे कहते हैं -
"इस दृष्टि से विचार करने पर सभी कवि हमें दो श्रेणियों में विभक्त दिखाई देते हैं. एक श्रेणी उन कवियों की बनती है, जो अपनी आनंददायिनी कला का उपयोग मुख्यतः जीवन को प्रभावित करने के लिए करते हैं, सभ्यता को परिवर्तित करने अथवा उसके मूल्यों की रक्षा करने के लिए करते हैं. और दूसरी श्रेणी में वे कवि आते हैं, जिनका ध्येय मुख्यतः भावों का निरूपण, सौन्दर्य का चित्रण और अनुभूतियों का आख्यान है. बाल्मीकि, व्यास, तुलसीदास, इकबाल और क़ाज़ी नजरूल इस्लाम को हम पहली श्रेणी में रखेंगे और दूसरी श्रेणी में कालिदास, बाणभट्ट, अमरूक, जयदेव, रहस्यवादी कबीर, सूरदास, विद्यापति, बिहारीलाल, ग़ालिब और महादेवी आदि का स्थान होगा. यदि हम चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि पहली श्रेणी के कवि कवि हैं और दूसरी श्रेणी के कवि कलाकार हैं. काव्यकला का विलक्षण उपयोग तो दोनों श्रेणियों के मनीषी करते हैं, किन्तु जिसके भीतर कर्तव्य  की चेतना होती है, उसकी रचना में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई उद्देश्य भी होता है. किन्तु जो कवि केवल सौन्दर्य का प्रेमी है, वह शुद्ध कलाकार बन जाता है.”
दिनकरजी एक विशेष दर्शनशास्त्र के प्रतिपादक हैं. यह कोई नया दर्शनशास्त्र नहीं है. वर्तमान काल के इस दर्शन के प्रतिपादक राममोहन राय से लेकर राधाकृष्णन तक सभी रहे हैं, इसलिए दिनकरजी की यह खोज उतनी शुद्ध नहीं है, जितनी कि देखने में लगती है. वे साफ़ कहते हैं - धर्म और रहस्यवाद की  भावना मनुष्य से छीनी नहीं जा सकती. आदमी ज्ञान के रास्ते से चले या विज्ञान के रास्ते से, वह अंत में एक ऐसी जगह पहुंचकर रहता है, जहाँ बुद्धि काम नहीं करती, जहाँ की अनुभूतियों को हमारी भाषा आसानी से नहीं उठा सकती. विज्ञान जितना ही आगे बढेगा वह धर्म से दूर होता जाएगा, किन्तु एक दिन वह भी उस बिंदु पर पहुंचनेवाला है, जहाँ अधिभौतिकता  अथवा अंतर्मुखी वृत्ति की सत्ता स्वीकार कर लेगा. धर्म का दूसरा दौर बुद्धिवाद की निस्सहायता की अनुभूति से उत्पन्न होगा. वह बारी-बारी से कई रूपों से होकर गुजरेगा तब पश्चिम के लोग, विज्ञान का उपयोग करते हुए भी, उसे अपना मार्ग-दर्शक नहीं मानेंगे. मार्ग-दर्शन के लिए वे शायद किसी पैगम्बर या अवतार का  इंतजार करेंगे और अंत में उनकी अपनी ही इच्छाओं और आशाओं से एक या अनेक पैगम्बर उत्पन्न होंगे, जो उस संस्कृति का पथ प्रदर्शन करेंगे.
इस प्रकार का चिंतन रहस्यवादी-अध्यात्मवादी प्रतीत होने पर भी अन्ततोगत्वा पराजयवादी है और यह पराजयवाद उन्हीके द्वारा किये हुए इतिहास के मूल्यांकन में प्रकट है.
क्रमशः.
अब दिनकर जी की एक कविता
 
समर शेष है
ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कास खोलो,
किसने कहा, युद्ध की बेला गयी, शांति से बोलो.
किसने कहा, और मत बढो हृदय वह्नी के शर से,
भरो भुवन का अंग कुसुम से, कुंकुम से, केशर से ?
कुंकुम लेपूँ किसे ? सुनाऊँ किसको कोमल गान ?
                तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान .
फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतरानेवाले
ओ रेशमी नगर के वासी ! ओ छवि के मतवाले !
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है.
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है.
मखमल के परदों के बाहर, फूलों के उस पार,
              ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट का संसार !
वह संसार जहाँ पर पहुंची अब तक नही किरण है,
जहाँ क्षितिज है शून्य अभी तक अम्बर तिमिर वरण है.
देख जहाँ का दृश्य आज भी अतंस्तल हिलता है.
माँ को लज्जावसन और शिशु को न क्षीर मिलता है.
पूछ रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
              सात वर्ष हो गए, राह में अटका कहाँ स्वराज ?
अटका कहां स्वराज ? बोल दिल्ली ! तू क्या कहती है ?
तू रानी बन गयी, वेदना जनता क्यों सहती है ?
सब के भाग दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में ?
समर शेष, है यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा.
              और नहीं, तो तुझपर पापिनी ! महावज्र टूटेगा !
समर शेष है, इस स्वराज्य को सत्य बनाना होगा.
जिसका है यह न्यास, उसे सत्वर पहुंचाना होगा.
धारा के मग में अनेक पर्वत जो खड़े हुए हैं,
गंगा का पथ रोक इंद्र के गज जो अड़े हुए हैं;
कह दो उनसे, झुके अगर तो जग में यश पायेंगे,
               अड़े रहे तो ऐरावत पत्तों से बह जायेंगे.
समर शेष है, जनगंगा को खुलकर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो.
पथरीली, ऊंची जमीन है, तो उसको तोड़ोगे,
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे.
समर शेष है,  चलो ज्योतियों के बरसाते तीर .
               खंड - खंड हो गिरे विषमता की काली जंजीर .
समर शेष है,  अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं,
गांधी का पी लहू जवाहर पर फुंकार रहे हैं.
समर शेष है,  अहंकार इनका हारना बाकी है,
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विश करना बाकी है.
समर शेष है,  शपथ धर्म की, लाना है वह काल,
               विचरें अभय देश में गांधी और जवाहरलाल.
तिमिर-पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्कांड रचे ना.
सावधान हो खड़ी देश भर में गांधी   की सेना.
बलि देकर भी बली ! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ' मस्जिद, दोनों   पर एक  तार  बांधो  रे !
समर शेष है,  नहीं पाप  का भागी  केवल  व्याध,
               जो तटस्थ  है, समय लिखेगा उनका भी अपराध.
(परशुराम  की प्रतीक्षा  - 1954 )
पिछले पोस्ट के लिंक

1. देवता हैं नहीं  2.  नाचो हे, नाचो, नटवर 3. बालिका से वधू  4. तूफ़ान  5.  अनल - किरीट 6. कवि की मृत्यु 7. दिगम्बरी 8. ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल ! 9.दिल्ली 10. विपथगा 11. हिमालय  12 .हाहाकार  13. परशुराम की प्रतीक्षा 14.एक बार फिर स्वर दो !


12 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन लेखन.....
    समर शेष है पढ़ कर बहुत अच्छा लगा....
    कवि और कलाकार का भेद भी समझा...

    सादर
    अनु

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  2. धर्म का दूसरा दौर बुद्धिवाद की निस्सहायता की अनुभूति से उत्पन्न होगा. वह बारी-बारी से कई रूपों से होकर गुजरेगा तब पश्चिम के लोग, विज्ञान का उपयोग करते हुए भी, उसे अपना मार्ग-दर्शक नहीं मानेंगे. मार्ग-दर्शन के लिए वे शायद किसी पैगम्बर या अवतार का इंतजार करेंगे और अंत में उनकी अपनी ही इच्छाओं और आशाओं से एक या अनेक पैगम्बर उत्पन्न होंगे, जो उस संस्कृति का पथ प्रदर्शन करेंगे.
    प्रातः प्रणम्य है दिनकर....

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  3. आदमी ज्ञान के रास्ते से चले या विज्ञान के रास्ते से,
    वह अंत में एक ऐसी जगह पहुंचकर रहता है,
    जहाँ बुद्धि काम नहीं करती--

    उत्कृष्ट प्रस्तुति |
    शुभकामनायें ||

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  4. सच कहा है, एक जगह पहुँचकर बुद्धि काम नहीं करती है..हाथ कृपा के लिये उठ जाते हैं..

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  5. Pichhali kadee nahee padh payi thee jo aaj padhee....aaj kee bhee hamesha kee tarah behad achhee...kabhi tum bhi phn karke mere haalchaal poochh liya karo na!

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  6. यह है शुक्रवार की खबर ।

    उत्कृष्ट प्रस्तुति चर्चा मंच पर ।।

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  7. बलि देकर भी बली ! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
    मंदिर औ' मस्जिद, दोनों पर एक तार बांधो रे !
    समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
    जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनका भी अपराध.

    ....यह रचना आज भी उतनी ही समसामयिक है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...आभार

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  8. दिनकर की हुंकार अभी भी उतनी ही सामयिक है जितनी उस समय थी ,बल्कि आज स्थितियाँ पहले से भी बदतर हैं .देश की ऊर्जा को जगाने और सही दिशा देने के लिये हम कवि के चिर आभारी हैं ,और समय की नब्ज़ पहचान कर कर सचेत करने के लिये अनामिका जी आपके !

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  9. कविता पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा प्रतिभा जी की एक बात से पूर्णतः सहमत हूँ।

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  10. दिनकर को पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है .... आभार

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