सोमवार, 16 जुलाई 2012

कुरुक्षेत्र .... सप्तम सर्ग ... भाग - 9 / रामधारीसिंह दिनकर




प्रस्तुत संदर्भ  जब विजय के पश्चात युधिष्ठिर सभी बंधु- बांधवों  की मृत्यु से  विचलित हो कहते हैं कि यह राजकाज  छोड़ वो वन चले जाएंगे उस समय पितामह भीष्म उन्हें समझाते  हैं ---

मरुद्भित प्रति काल छिपाती 
सजग , क्षीण - बल तप को 
छाया में डूबती छोड़ कर 
जीवन के आतप को । 

कर्म - लोक से दूर पलायन 
कुंज बसा कर अपना 
निरी कल्पना में देखा 
करती अलभ्य  का सपना । 

वह सपना , जिस पर अंकित 
उंगली  का दाग नहीं है , 
वह सपना , जिसमे ज्वलंत 
जीवन की आग नहीं है । 

वह सपनों का देश कुसुम ही 
कुसुम जहां खिलते हैं , 
उड़ती कहीं न धूल , न पथ में 
कंटक ही मिलते हैं । 

कटु की नहीं , मात्र सत्ता है 
जहां मधुर , कोमल की 
लौह पिघल कर जहां रश्मि 
बन जाता विधु - मण्डल की । 

जहां मानती  हुक्म  कल्पना 
का जीवन धारा है 
होता सब कुछ वही , जो कि
मानव - मन को प्यारा है ।

उस विरक्त से पूछो  , मन से 
वह जो देख रहा है , 
उस कल्पना जनित जग का 
भू पर अस्तित्व  कहाँ है ? 

कहाँ  वीथि है वह , सेवित है 
जो केवल फूलों से 
कहाँ पंथ  वह , जिस पर छिलते 
चरण नहीं  शूलों से ?

कहाँ वाटिका वह , रहती जो 
सतत प्रफुल्ल हरी है ?
व्योम खंड  वह कहाँ , 
कर्म - रज जिसमें  नहीं भरी है ? 

वह तो भाग छिपा चिंतन में 
पीठ फेर कर रण से , 
विदा हो गए , पर , क्या इससे 
दाहक दुख भुवन  से ? 

और , कहें  , क्या स्वयं उसे 
कर्तव्य  नहीं करना है ?
नहीं कमा कर सही , भीख से 
क्या न  उदर भरना  है   ? 

कर्म भूमि है निखिल महीतल 
जब तक नर की काया 
तब तक है जीवन के अणु - अणु 
में कर्तव्य  समाया । 

क्रिया धर्म को छोड़ मनुज 
कैसे निज  सुख पाएगा ?
कर्म रहेगा साथ , भाग वह 
जहां  कहीं जाएगा । 

धर्मराज , कर्मठ मनुष्य का 
पथ सन्यास नहीं है , 
नर जिस पर चलता , वह 
मिट्टी है  , आकाश नहीं है । 

ग्रहण कर रहे जिसे आज 
तुम निर्वेदाकुल मन से 
कर्म - न्यास वह तुम्हें दूर 
ले जाएगा जीवन से । 

दीपक का निर्वाण  बड़ा कुछ 
श्रेय नहीं जीवन का , 
है सद्धर्म  दीप्त रख उसको 
हरना तिमिर भुवन का । 

भ्रमा  रही तुमको विरक्ति जो , 
वह अस्वस्थ , अबल है , 
अकर्मण्यता की छाया , वह 
निरे ज्ञान का छल है । 

बचो युधिष्ठिर , कहीं डुबो दे 
तुम्हें न  यह चिंतन में , 
निष्क्रियता का धूम भयानक 
भर न जाये जीवन में । 


7 टिप्‍पणियां:

  1. कर्म भूमि है निखिल महीतल
    जब तक नर की काया
    तब तक है जीवन के अणु - अणु
    में कर्तव्य समाया ।

    ये बात ही तो समझने वाली है ………आभार

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  2. क्रिया धर्म को छोड़ मनुज
    कैसे निज सुख पाएगा ?
    कर्म रहेगा साथ , भाग वह
    जहां कहीं जाएगा ।
    कर्म ही जीवन की सार्थकता ही ..आभार !!

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  3. भ्रमा रही तुमको विरक्ति जो ,
    वह अस्वस्थ , अबल है ,
    अकर्मण्यता की छाया , वह
    निरे ज्ञान का छल है ।

    बचो युधिष्ठिर , कहीं डुबो दे
    तुम्हें न यह चिंतन में ,
    निष्क्रियता का धूम भयानक
    भर न जाये जीवन में ।
    कितनी सार्थक पंक्तियाँ हैं.

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  4. य़ह पोस्ट मुझे बहुत अच्छा लगता है। धन्यवाद।

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  5. धर्मराज , कर्मठ मनुष्य का
    पथ सन्यास नहीं है ,
    नर जिस पर चलता , वह
    मिट्टी है , आकाश नहीं है ।
    जीवन का सार यही है। धरती पर चलने पर फूल के साथ शूल भी मिलते ही रहेंगे।

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  6. दीपक का निर्वाण बड़ा कुछ
    श्रेय नहीं जीवन का ,
    है सद्धर्म दीप्त रख उसको
    हरना तिमिर भुवन का ।


    isi se hame seekh leni chaahiye. aur apni nirashaakaleen me in panktiyon ko kanthast karna chaahiye.

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