गुरुवार, 12 जुलाई 2012

आग की भीख

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nआदरणीय  पाठक वृन्द   को   अनामिका का सादर प्रणाम   !  साथियो आज यह  दिनकर  जी के व्यक्तित्व  और कृतित्व पर आधारित  साहित्यिक सफ़र की अंतिम कड़ी  हैं.  इस अंक में पढ़ते  हैं उनकी पुस्तक 'शुद्ध कविता की खोज' पर उनके कुछ और विचार और राष्ट्रीयता पर उनकी सोच  ....

दिनकरजी जीवन दर्पण - भाग - 16

 

दिनकर जीअंतिम चार पंक्तियाँ दिनकर जी का परिचय देती हुई...

 

बंधा तूफ़ान हूँ, चलना मना है

बंधी उद्दाम निर्झर - धार हूँ मैं,

कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी ?

बंधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं.

 

"दुनिया का इतिहास दुनिया की असली अदालत है. उसका फैसला उन लोगों के खिलाफ कभी नहीं गया है जो ज्यादा ताकतवर और ज्यादा पूरे मर्द थे, जिनकी धर्म-कर्म भावना अत्यंत प्रखर थी,  जिनका आत्म-विश्वास अदम्य था. इस अदालत ने बराबर शक्ति और नस्ल की मजबूती पर सच्चाई और इंसाफ को कुर्बान किया है. और इस अदालत ने उन जातियों को हमेशा सजा दी है, जो सत्य को कर्म से तथा न्याय को शक्ति से अधिक महत्त्व देती थीं. गेटे ने कहा था, 'कर्मठ पुरुष विवेकशून्य होते हैं'. विवेकशून्यता उन सभी लोगों का गुण है जो लडाई में भाग लेते हैं. अच्छे बुरे का ज्ञान सिर्फ तमाशबीनों का होता है, जो निरापद और लडाई से दूर हैं".

क्या उक्त विचारों से ईश्वरवाद या धर्म को बल मिलता है ? या इससे अस्तित्ववाद की कड़ी बू आती है ? इस प्रकार इस पुस्तक के पाठक की एक अजीब स्थिति होती है कि एक तरफ तो दिनकरजी नये कवियों को यह सीख देते हैं कि धर्म और रहस्यवाद से कोई बच नहीं सकता और दूसरी तरफ वे इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि संसार में शक्ति और नस्ल कि जय-जय कार रही है. इस दुधारा और अंतर्विरोध के कारण पुस्तक की दिलचस्पी घटी नहीं, बल्कि बढ़ी है और यह भी कहा जा सकता है कि इस हद तक दिनकरजी की यह पुस्तक युग-मन के द्विमनस्क फटेपन को भी खोलकर सामने रखने में समर्थ हुई है.

आश्चर्य है कि राष्ट्रीय भावों पर चढ़ कर उदित होनेवाले दिनकर जी राष्ट्रीयता के विरुद्ध हो गए थे. राष्ट्रीयता उन्हें उतनी ही दूर तक ग्राह्य थी जितनी दूर तक वह अंतर्राष्ट्रीय भावनाओं के विकास में सहायक होती हैं. 'नील कुसुम' में उनकी एक कविता का शीर्षक 'राष्ट्र्देवता का विसर्जन' है और अपनी इस विचारधारा को उन्होंने कई निबंधों और भाषणों में भी पल्लवित किया है. फिर भी यह परिवर्तन स्थायी नहीं था, न धर्म की तरह राष्ट्रीयता दिनकर के निकट एक चली हुई गोली बन गयी. ठीक है, राष्ट्रीयता जहाँ तक कि वह पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक हथियार थी, प्रगतिशील थी, पर अब वह प्राच्य देशों में भी (पाश्चात्य में तो वह पहले ही प्रतिक्रियावादी बन चुकी थी ) प्रतिक्रियावादी बनती जा रही है. पर चीनी आक्रमण ने दिनकर जी को फिर एक बार देशभक्ति के आवेश में डाल दिया. इस देशभक्ति के आवेश में बंदरगाह में बंधी गांधीवाद की सुंदर नाव भी बह गयी. जो कुछ भी हो, इससे प्रमाणित होता है कि दिनकरजी किसी व्यक्ति या सिद्धांत के प्रति इतने प्रतिबद्ध नहीं थे कि वे नये वातावरण में नया आक्सीजन ग्रहण करने में चूक या कतरा जाते. इसी गुण के कारण वे वर्तमान जीवन की सारी क्षुद्रताओं, सीमाओं आदि के बावजूद जनप्रिय महाकवि रहेंगे. कोई उनसे कुछ लेगा कोई कुछ. कहा गया है पूर्वापरसंगति गदहे का ही गुण है. दिनकरजी में पूर्वापरसंगति ढूँढने पर कुछ हाथ नहीं लगने का. क्योंकि वे साहित्य-गगन के दिनकर हैं. जिनसे निरंतर ऊर्जा की ही वर्षा हो रही है. फिर कौन ऐसा महाकवि है जिसमे पूर्वापरसंगति  है ?

दिनकरजी के नश्वर शरीर का अंत २५ अप्रेल १९७४ को मद्रास में हुआ. पर जब तक हिंदी भाषा रहेगी, वे अमर हैं.

साथियों आज इस अंतिम कड़ी के साथ ही  दिनकर जी के साहित्य सफ़र को यहीं विश्राम देती हूँ.  प्रस्तुत है दिनकर जी की ज्वलंत रचना 'आग की भीख'.

आग की भीख

धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है?
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ।

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।

आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ।

- दिनकर

* * *

11 टिप्‍पणियां:

  1. लाजवाब पोस्ट। धन्यवाद अनामिका जी।

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  2. दिनकर जी की पूरी शृंखला के लिए साधुवाद

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  3. आपने एक महत्वपूर्ण श्रृंखला का समापन किया। हमें दिनकर जी के जीवन के विभिन्न आयामों से परिचय कराया। आभार आपका।
    एक नई श्रृंखला की आशा है।

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  4. आपने दिनकर जी के जीवन पहलु पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवायी आप का हार्दिक आभार
    बेहतरीन पंक्तियाँ है ......
    आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
    बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
    अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है,
    है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
    निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
    निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
    पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
    जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. इस ज्वलंत रचना को यहा पढ़वाने और श्री दिनकर जी के विषय में अब तक महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  6. मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
    अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
    भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
    सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
    इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
    पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
    उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
    विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।
    .
    विस्फोटक रचना...विश्वजनीन...

    दिनकर जी पर यह आलेख शृंखला रोचक लगी.

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  7. बहुत ही रुचिकर शृंखला संपूर्ण हुई - मन तृप्त हुआ .
    ऐसे कवियों का काव्य ही जन-जीवन का संस्कार करता है.दिनकर का काव्य हमारे काव्य-साधकों के अंतर में वही तेजस्विता ,और राष्ट्र- प्रेम जगा सके यही कामना लेकर आपके प्रति आभार प्रकट करती हूँ ,अनामिका जी !

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  8. आप सब ने इस शृंखला में रूचि ली और अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त किये, आपकी आभारी हूँ.

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  9. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर
    आधारित है जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं,
    पंचम इसमें वर्जित है, पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग
    भी किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.
    ..

    हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर ने दिया है.

    .. वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में
    चिड़ियों कि चहचाहट से मिलती है.
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