शुक्रवार, 11 मई 2012

दोहावली ..... भाग - 11 / संत कबीर दास



जन्म  --- 1398
निधन ---  1518

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे सूर

तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान पूर 101


आस पराई राख्त, खाया घर का खेत

औरन को प्त बोधता, मुख में पड़ रेत 102


सोना, सज्जन, साधु जन, टूट जुड़ै सौ बार

दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, ऐके धका दरार 103


सब धरती कारज करूँ, लेखनी सब बनराय

सात समुद्र की मसि करूँ गुरुगुन लिखा जाय 104


बलिहारी वा दूध की, जामे निकसे घीव

घी साखी कबीर की, चार वेद का जीव 105


आग जो लागी समुद्र में, धुआँ प्रकट होय

सो जाने जो जरमुआ, जाकी लाई होय 106


साधु गाँठि बाँधई, उदर समाता लेय

आगे-पीछे हरि खड़े जब भोगे तब देय 107


घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार

बाल सने ही सांइया, आवा अन्त का यार 108


कबिरा खालिक जागिया, और ना जागे कोय

जाके विषय विष भरा, दास बन्दगी होय 109


ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच होय

सौरन कलश सुरा, भरी, साधु निन्दा सोय 110


क्रमश:


5 टिप्‍पणियां:

  1. कल 012/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .

    धन्यवाद!

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  2. सोना, सज्जन, साधु जन, टूट जुड़ै सौ बार ।

    दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, ऐके धका दरार ॥ 103 ॥
    सुन्दरतम..

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