सोमवार, 14 मई 2012

कुरुक्षेत्र ... षष्ठ सर्ग .... भाग - 4 / रामधारी सिंह दिनकर




रसवती भू के मनुज का श्रेय , 
यह नहीं विज्ञान कटु , आग्नेय । 
श्रेय उसका प्राण  में बहती प्रणय की वायु , 
मानवों के हेतु अर्पित मानवों की आयु ।

श्रेय उसका  आंसुओं की धार , 
श्रेय उसका भग्न वीणा की अधीर पुकार ।
दिव्य भावों के जगत में जागरण का गान,
मानवों का श्रेय आत्मा का किरण - अभियान । 

यजन अर्पण , आत्म  सुख का त्याग ,
श्रेय मानव का तपस्या की दहकती आग । 
बुद्धि - मंथन से विनिगत श्रेय वह नवनीत , 
जो करे नर के हृदय को स्निग्ध , सौम्य , पुनीत ।
श्रेय वह विज्ञान का वरदान , 
हो सुलभ सबको सहज जिसका  रुचिर अवदान । 
श्रेय वह नर - बुद्धि का शिवरूप  आविष्कार , 
ढो  सके जिससे प्रकृति  सबके सुखों का भार । 
मनुज के श्रम के अपव्यय की प्रथा रुक जाये , 
सुख - समृद्धि - विधान में नर के प्रकृति झुक जाये । 

श्रेय होगा मनुज का समता - विधायक ज्ञान , 
स्नेह - सिंचित न्याय पर नव विश्व का निर्माण । 
एक नर में अन्य का नि:शंक  , दृढ़ विश्वास , 
धर्म दीप्त  मनुष्य का  उज्ज्वल  नया इतिहास -
समर , शोषण , ह्रास की विरुदावली से  हीन, 
पृष्ठ  जिसका एक भी होगा न दग्ध , मलिन । 
मनुज का इतिहास , जो होगा सुधामय  कोष , 
छलकता होगा सभी नर का जहां संतोष । 

युद्ध की ज्वर - भीति से हो मुक्त , 
जब कि  होगी , सत्य  ही , वसुधा सुधा से युक्त ।
श्रेय होगा सुष्ठु - विकसित मनुज का यह काल , 
जब नहीं होगी धरा नर के रुधिर से लाल ।
श्रेय होगा धर्म का आलोक वह  निर्बन्ध , 
मनुज जोड़ेगा  मनुज से  जब उचित संबंध ।
साम्य  कि वह रश्मि स्निग्ध , उदार ,
कब खिलेगी , कब खिलेगी विश्व में भगवान ?
कब सुकोमल  ज्योति से  अभिसिक्त 
हो सारस होंगे  जली - सूखी  रसा के प्राण ? 


क्रमश: 


प्रथम सर्ग --        भाग - १ / भाग –२

द्वितीय  सर्ग  --- भाग -- १ / भाग -- २ / भाग -- ३ 

तृतीय सर्ग  ---    भाग -- १ /भाग -२

चतुर्थ सर्ग ---- भाग -१    / भाग -२  / भाग - ३ /भाग -४ /भाग - ५ /भाग –6 




षष्ठ  सर्ग ---- भाग - 1भाग -2 / भाग -3







11 टिप्‍पणियां:

  1. accha kaam kr rehe hai ,dinkar jaise mahan lekhak ki rachna batne ke liye dhanywad

    http://blondmedia.blogspot.in/

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  2. पढ़ रहे हैं लगातार.. आभार

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  3. कुरुक्षेत्र का संदेश मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना भी है।

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  4. पढ़कर बहुत अच्छा लगा...आभार!

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  5. kar baddh hai har insaan aaj bhi ki मनुज जोड़ेगा मनुज से जब उचित संबंध ।
    साम्य कि वह रश्मि स्निग्ध , उदार ,
    कब खिलेगी , कब खिलेगी विश्व में भगवान ?

    prashansneey prayas.

    aabhar.

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  6. मनुज के श्रम के अपव्यय की प्रथा रुक जाये ,
    सुख - समृद्धि - विधान में नर के प्रकृति झुक जाये ।
    बहुत सारगर्भित सार्कालिक प्रासंगिक रचना .कृपया 'धरा' कर लें धारा छप गया है .

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  7. आपकी प्रस्तुति जीवन में आदर्श भाव की प्रतिस्थापना में निर्णायक भूमिका अदा करेगी । कुरूक्षेत्र का हर शब्द हमें बहुत कुछ सीखा जाता है । धन्यवाद ।

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