गुरुवार, 17 मई 2012

ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल !

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nआप सब को अनामिका का प्रणाम ! आईये आज जानते हैं कि साहित्य की निस्वार्थ सेवा करने वाले हमारे महान लेखकों / कवियों/ साहित्यकारों को अपने परिवार, रोजी-रोटी और नौकरी की खट-पट के साथ-साथ अपने  जीवन में और  क्या -क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं...

पिछले पोस्ट के लिंक

१. देवता हैं नहीं २.  नाचो हे, नाचो, नटवर ३. बालिका से वधू ४. तूफ़ान ५.  अनल - किरीट ६. कवि की मृत्यु ७. दिगम्बरी


दिनकर जी अपने बारे में कहते  हैं...

समाना चाहती है जो बीन उर में

विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं

भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में,

सुना है ज्योति का अंगार  हूँ मैं.

 

दिनकर जी पर एक बार एक मुसीबत 1940   में आई जब गाँधी जी क्रांतिकारी परिस्थिति की पुकार सुनी-अनसुनी करके इस दुविधा में पड़े थे कि आन्दोलन छेड़ा जाए या नहीं. उस समय बेनीपुरी और मथुराप्रसाद मिश्र  ' जनता'  नामक साप्ताहिक निकलते थे. उस पत्र का कोई विशेषांक निकलनेवाला था. बेनिपुरीजी ने दिनकरजी को तार दिया कि कोई कविता तुरंत भेजो. दिनकरजी ने गांधीजी की  द्विधा पर जोरदार कविता लिखी और उन्हें आन्दोलन छोड़ने को प्रेरित किया ( यह कविता वर्तमान संग्रह में -'ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल' शीर्षक से मौजूद है, जो नीचे भी दी गयी है.). इस बार कविता प्रत्यक्ष रूप से सरकार के विरुद्ध थी, इसलिए लेखक की जगह उसमे दिनकर नहीं, बल्कि  अमिताभ नाम दिया गया था. किन्तु मथुरा बाबू के नाम जो पद्यबद्ध पत्र था उससे दिनकरजी का नाम प्रकट हो जाता था.

                                             यह तो दिनकर का कृत्य नहीं,

                                             अमिताभ देव का तुष्ट्कर्म !

संकेत यह था कि इसे दिनकर नहीं, अमिताभ के नाम से छापो. लेकिन यह लिफाफा डाकघर से सीधे सरकारी दफ्तर में पहुँच गया और 'जनता' ऑफिस में वह तब भेजा गया जब उसका फोटो लिया जा चुका था. कविता 'जनता' में अमिताभ नाम से ही छपी, पर कोई महीने भर बाद दिनकरजी के कानों में यह बात पहुंची कि कविता सेंसर हुई है. यह सूचना उन्हें पंडित केदारनाथ मिश्र 'प्रभात' से मिली थी, जो बिहार के प्रसिद्द कवि थे और पुलिस विभाग में नौकरी करते थे. लेकिन जानते हुए भी यह खबर बेनीपुरी जी ने दिनकरजी को नहीं भेजी. उल्टे मोतिहारी किसान सम्मलेन में भेंट होने पर दिनकरजी ने जब यह बात चलायी तब बेनिपुरीजी बोले - अरे, नौकरी छूट गयी तो हमारे गिरोह में आ मिलना. हम तो चाहते ही हैं कि तुम्हारी नौकरी छूट जाये.

लेकिन नौकरी तब भी नहीं छूटी. सरकार  ने फिर एक चेतावनी भिजवाई. इस बार दिनकरजी के जिला मजिस्ट्रेट खान बहादुर अमीर थे, जो अवकाश लेकर हजारीबाग में रहे. अमीर साहब से बात होने पर दिनकरजी ने कहा - गुमनाम चीज़ की जवाबदेही मुझपर क्यों डाली जाती है ?

अमीर साहब हंसकर बोले - आपका बचपना नहीं जाएगा - बिना प्रमाण के चेतावनी नहीं दी जाती. जरा संभलकर चला कीजिए. और बात वहीँ ख़त्म हो गयी. अवश्य ही जिला मजिस्ट्रेट ने दिनकर जी की रक्षा की होगी.

सरकार ने दिनकरजी को नौकरी से तो नहीं निकाला, पर तकलीफ उन्हें काफी दी गयी. जिसका एक रूप यह भी रहा कि चार साल के अन्दर इनके बाईस बार तबादले किये गए.  'कल्पना' में प्रकाशित अपने एक संस्मरण में दिनकर जी ने लिखा, "घबराहट में आकर कई बार मैंने सोचा कि नौकरी छोड़ दूँ. किन्तु तीन बातें थीं, जिनके कारण मैं नौकरी नहीं छोड़ सका. पहली तो यह कि नौकरी छूट गयी तो परिवार खायेगा क्या ? दूसरी यह कि हर तबादले के साथ मुझे चार-छह दिनों की छुट्टियाँ मिल जाती थीं जिन्हें मैं जायसवालजी के सानिध्य में बिताने को पटना चला जाता था. और तीसरी यह कि जयप्रकाश जी बराबर यह शह देते रहते थे कि अपेक्षा बरतरफ हो जाना ही श्रेष्ठ है".


दिनकरजी स्वयं नौकरी छोड़ने को तैयार नहीं थे. यदि वे बर्खास्त कर दिए गए होते तो इससे अंग्रेजों की निंदा तो होती, पर उससे दिनकर जी का अपरिमित उपकार हुआ होता जो शायद जयप्रकाशजी और बेनिपुरीजी का लक्ष्य था. लेकिन दिनकरजी का सौभाग्य इस सुयश से खाली रह गया और युद्ध के दो-तीन साल बीत जाने पर अंग्रेजी सरकार ने उनका तबादला युद्ध -प्रचार विभाग में कर दिया.

क्रमशः

लीजिये प्रस्तुत है दिनकर जी की एक और जोरदार कविता जो उन्होंने दुविधा में पड़े गांधी जी को आन्दोलन के लिए प्रेरित करते हुए लिखी थी...

ओ द्विद्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल  !

हिल रहा  धरा  का  शीर्ण मूल

जल   रहा  दीप्त  सारा खगोल,

तू सोच रहा क्या अचल मौन ?

ओ  द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल  !

जाग्रत जीवन की चरम ज्योति

लड़  रही  सिन्धु  के आर-पार ;

संघर्ष      सब     ओर,     एक

हिमगुहा-बीच घन- अन्धकार !

प्लावन  के  खा   दुर्जय   प्रहर

तब  रहे  सकल  प्राचीर  कांप,

जब  तू  भीतर  क्या सोच रहा

है  क्लीव-धर्म  का पृष्ठ  खोल ?

क्या पाप-मोक्ष  का भी प्रयास

ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल  !

बुझ गया ज्वलित पौरुष प्रदीप

या  टूट  गए नख-रद कराल ?

या  तू लख कर भयभीत हुआ

लपटें चारों दिशी लाल-लाल ?

दुर्लभ  सुयोग,  यह  वह्नी-वाह

धोने     आया    तेरा   कलंक

विधि का यह नियत विधान तुझे,

लड़  कर  लेना  है मुक्ति मोल !

किस असमंजस में अचल मौन

ओ  द्विधाग्रस्त  शार्दूल, बोल  !

संसार  तुझे  दे  क्या  प्रमाण ?

रक्खे सम्मुख किसका चरित्र ?

तेरे    पूर्वज   कह   गए   "युद्ध

चिर अनघ और शाश्वत पवित्र !"

तप से खिंच आकर विजय पास

है  मांग  रही   बलिदान  आज,

"मैं    उसे   वरूँगी,   होम  सके

स्वागत में जो वन-प्राण आज ! "

है  दहन  मुक्ति  का  मन्त्र  एक

सुन,  गूँज  रहा  सारा  खगोल ;

तू सोच रहा क्या अचल मौन

ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल, बोल  !

नख दन्त देख मत ह्रदय हार,

गृह  भेद  देख  मत हो अधीर;

अंतर  की  अतुल  उमंग  देख,

देखे,   अपनी    जंजीर   वीर !

यह  पवन परम अनुकूल देख,

रे,  देख भुजा का बल अथाह,

तू  चले   बेड़ियाँ   तोड़  कहीं;

रोकेगा    आकर  कौन  राह ?

डगमग धरणी पर दमित तेज

सागर   पारे    सा   उठे  डोल;

उठ जाग, समय अब शेष नहीं,

भारत  माँ  के  शार्दूल , बोल  !

१९४०

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ओजस्वी कविता है ,पता नहीं अब देश में कोई शार्दूल बचा है भी या सब लुप्त हो गये !

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  2. अनामिका जी, आपको किस नाम से संबोधित करूं क्योंकि "अनामिका" शब्द लिखते ही मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपके लिए मेरा संबोधन प्राय: अधूरा सा रह जाता है । आपके पिछले पोस्ट पर न आ सका क्योंकि मैं छुट्टी पर अपने गांव गया था । दिनकर जी के बारे में रोचक बातों से परिचय कराती आपकी हर पोस्ट हमें कुछ दे जाती है । आपके इस समर्पण की पृष्ठभूमि में दिनकर जी के साथ मानसिक रूप से जुड़ाव इस बात का द्योतक है कि आपकी उनकी प्रति असीम श्रद्धा है । मैंने पढ़ा है कि दिनकर, बच्चन एवं बाबा नागार्जुन ने भी अपने जीवन में बहुत संघर्ष किए हैं । बच्चन जी अपनी रचनाओं को सर पर लेकर स्वयं प्रकाशक के पास से ले आते थे । बाबा नागार्जुन अपने संपूर्ण जीवन काल में मसिजीवी ही बने रह गए एवं अपने जीवन यापन के लिए किसी भी प्रकार की राजकीय आर्थिक सहायता को स्वीकार नही किया । साहित्य के प्रति हिंदी साहित्य के इन हस्ताक्षरों की अनुपम देन को याद करना ही उनके प्रति हमारी सही श्रद्धांजलि होगी । जीवन में अनेक विषम परिस्थितियों से गुजरने वाले रामधारी सिंह दिनकर जी ने अपने संघर्षों का हवाला देते हुए अपनी "हार" नामक कविता में लिखा है -

    हार कर मेरा मन पछताता है
    क्योंकि
    तुम्हे हारा हुआ आदमी पसंद नही आता है ।

    क्या कोई दिन याद है!

    जब तीर धनुष सिरहाने ऱख कर छांव में कभी सोया हूं।

    किरणें कभी-कभी कौंध कर,
    चली जाती हैं,
    पर बाकी जिंदगी अंधेरी रात है ।

    धन्यवाद ।

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  3. उनके बेले पापद का स्वाद कभी खत्म नही होगा। शानदार प्रस्तुति। बधाई\

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  4. समाना चाहती है जो बीन उर में
    विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं
    भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में,
    सुना है ज्योति का अंगार हूँ मैं....... pathniya shrinkhla

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  5. 'ज्योति के अंगार' दिनकर जी पर आपकी यह श्रृंखला अत्यंत सराहनीय है ! उनकी इस दुर्लभ एवं ओजस्वी रचना को पढ़ कर आनंद आ गया ! साभार !

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  6. दिनकर जी के जीवन संघर्षों से नज़दीक से वाकिफ करवाती पोस्ट उनके अंतर की आंच को और दहकाती सी .
    कृपया यहाँ भी पधारें -
    बृहस्पतिवार, 17 मई 2012
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  7. डगमग धरणी पर दमित तेज

    सागर पारे सा उठे डोल;

    उठ जाग, समय अब शेष नहीं,

    भारत माँ के शार्दूल , बोल !

    बहुत तेजस्वी पंक्तियाँ आज इनकी बहुत आवश्यकता है, आभार इस सुंदर प्रस्तुति के लिये.

    उत्तर देंहटाएं
  8. ओजस्वी हुंकार ………शानदार प्रस्तुति

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  9. इस श्रृंखला को दो सबसे बड़ी विशेषता है। एल जो घटनाक्रम आप प्रस्तुत करती हैं, वह पहले कभी नहीं सुनी होती। दूसरी, जो कविता आप प्रस्तुत करती हैं, वह कभी पढ़ी नहीं होती। सो दोनों ही नया लगता है। यानी नयापन इसकी विशेषता है।

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