कितनी नावों में कितनी बार - अज्ञेय
कितनी दूरियों से कितनी बार
कितनी डगमग नावों में बैठ कर
मैं तुम्हारी ओर आया हूं
ओ मेरी छोटी-सी ज्योति !
कभी कुहासे में तुम्हें न देखता भी
पर कुहासे की ही छोटी-सी रुपहली झलमल में
पहचानता हुआ तुम्हारा ही प्रभा-मंडल।
कितनी बार मैं,
धीर, आश्वस्त, अक्लान्त –-
ओ मेरे अनबुझे सत्य ! कितनी बार ...
और कितनी बार कितने जगमग जहाज
मुझे खींच कर ले गए हैं कितनी दूर
किन पराए देशों की बेदर्द हवाओं में
जहां नंगे अंधेरों को
और भी उघाड़ता रहता है
एक नंगा, तीखा, निर्मम प्रकाश –-
जिस में कोई प्रभा-मंडल नहीं बनते
केवल चौंधियाते हैं, तथ्य, तथ्य -– तथ्य –-
सत्य नहीं, अन्तहीन सच्चाइयां –-
कितनी बार मुझे
खिन्न, विकल, संत्रस्त –-
कितनी बार !
खूबसूरत
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रस्तुति ।
ब्बहुत सुन्दर रचना!...सुन्दर प्रस्तुति!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुन्दर..!
प्रत्युत्तर देंहटाएंkalamdaan
sundar
प्रत्युत्तर देंहटाएंकिन पराए देशों की बेदर्द हवाओं में
प्रत्युत्तर देंहटाएंजहां नंगे अंधेरों को
और भी उघाड़ता रहता है
एक नंगा, तीखा, निर्मम प्रकाश –-
bahut sudar rachna ......padhwane ke liye dhanyavad .....manoj jee....
्गहन अभिव्यक्ति।
प्रत्युत्तर देंहटाएंकितनी बार ...कितना सुन्दर ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुंदर और गहन भाव लिए ... आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंसच्ची शान्ति अन्ततः अपने आपसे, अपनी अन्तःज्योति से मिल कर ही मिलती है जब कोई प्रश्न प्रश्न नही रहता कोई भटकाव नही रहता । पर यही सबसे कठिन कार्य है । अज्ञेय जी की यह अनुपम कविता भी एक महासागर समेटे है अर्थों का । अर्थ जो भी हो पर पढ कर अच्छा लगा । धन्यवाद ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंकालजयी रचना!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंअज्ञेय की कवितायें एक साथ बहुत से अर्थ जगा जती हैं !
प्रत्युत्तर देंहटाएंबड़े जहाज़ सारे के सारे
प्रत्युत्तर देंहटाएंकाले कोसों ले जाते हैं
जादू की जगमग दुनिया में.
पर जब भी लौटा हूँ
अपने घर
काम आई छोटी डोंगी भर.
अद्भुत
प्रत्युत्तर देंहटाएंअंत:स तक उतरती रचना
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