सोमवार, 23 अप्रैल 2012

कुरुक्षेत्र ... षष्ठ सर्ग .... भाग - 1 / रामधारी सिंह दिनकर


प्रस्तुत भाग में  कवि आज भी आम जीवन में  चलने वाले कुरुक्षेत्र से चिंतित  है ... 

धर्म का दीपक , दया का दीप ,
कब जलेगा ,कब जलेगा , विश्व में भगवान ?
कब सुकोमल ज्योति से अभिसिक्त 
हो , सरस होंगे जली - सूखी रसा के प्राण ? 

है बहुत बरसी धरित्री  पर अमृत की धार ,
पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार ।
भोग - लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम ,
बह रही असहाय नर की भावना निष्काम ।

भीष्म हों अथवा युधिष्ठिर या कि हों भगवान ,
बुद्ध हों कि अशोक , गांधी हों कि ईसु  महान ;
सिर झुका सबको , सभी को श्रेष्ठ निज से मान ,
मात्र वाचिक ही उन्हे देता हुआ सम्मान ,
दग्ध कर पर को , स्वयं भी भोगता दुख - दाह ,
जा रहा मानव चला अब भी पुरानी राह । 

अपहरण  , शोषण वही , कुत्सित वही अभियान ,
खोजना  चढ़ दूसरों के भस्म पर उत्थान ;
शील से सुलझा न सकना आपसी व्यवहार ,
दौड़ना रह - रह उठा उन्माद की  तलवार ।
द्रोह से अब भी वही अनुराग 
प्राण में अब भी वही फुँकार भरता नाग । 

पूर्व युग सा आज का जीवन नहीं लाचार ,
आ चुका है दूर द्वापर से  बहुत संसार ;
यह समय विज्ञान का , सब भांति पूर्ण , समर्थ ;
खुल गए हैं गूढ संसृति के अमित गुरु अर्थ ।
चीरता तम  को , संभाले बुद्धि की पतवार 
आ गया है ज्योति की नव भूमि में संसार । 

आज की दुनिया विचित्र , नवीन ;
प्रकृति  पर सर्वत्र है , विजयी पुरुष आसीन ।
हैं बंधे नर के करों में वारी , विद्युत ,भाप ,
हुक्म पर चढ़ता उतरता है पवन का ताप ।
है नहीं बाकी कहीं व्यवधान ,
लांघ सकता नर सरित , गिरि , सिंधु एक समान । 

सीस पर आदेश कर अवधार्य ,
प्रकृति के सब तत्त्व  करते हैं मनुज के कार्य ।
मानते हैं हुक्म मानव का महा वरुणेश,
और करता शब्दगुण अंबर वहन  संदेश ।

नव्य नर की मुष्टि में विकराल 
हैं सिमटते जा रहे प्रत्येक क्षण दिक्काल ।

यह प्रगति निस्सीम ! नर का यह अपूर्व विकास ! 
चरण तल भूगोल ! मुट्ठी  में निखिल आकाश ! 

किन्तु है बढ़ता गया मस्तिष्क ही नि:शेष ,
छूट कर पीछे गया है रह हृदय का देश ; 
नर मानता नित्य नूतन बुद्धि का त्योहार ,
प्राण में करते दुखी हो  देवता चीत्कार । 

चाहिए उनको न केवल ज्ञान 
देवता हैं मांगते कुछ स्नेह, कुछ बलिदान ;
मोम -सी कोई मुलायम चीज ,
ताप पा कर जो उठे मन में पसीज - पसीज ;
प्राण के झुलसे विपिन में फूल कुछ सुकुमार ;
ज्ञान के मरू में सुकोमल भावना की धार ;
चाँदनी की रागनि , कुछ भोर की मुसकान ;
नींद में भूली हुई बहती नदी का गान;
रंग में घुलता हुआ खिलती कली का राज़ ;
पत्तियों पर गूँजती कुछ ओस की आवाज़ ;
आंसुओं में दर्द की गलती हुई तस्वीर ;
फूल की  , रस में बसी - भीगी हुई जंजीर ।

धूम , कोलाहल , थकावट धूल के उस पार ,
शीत  जल से पूर्ण कोई मंदगामी धार ;
वृक्ष के नीचे जहां मन को मिले विश्राम ,
आदमी काटे जहां कुछ छुट्टियाँ , कुछ शाम ।
कर्म - संकुल लोक - जीवन से समय कुछ छीन ,
हो जहां पर बैठ नर कुछ पल स्वयं में लीन ।

फूल - सा एकांत में उर खोलने के हेतु 
शाम को दिन की कमाई तोलने के हेतु । 

ले चुकी सुख - भाग समुचित से अधिक है देह ,
देवता हैं मांगते मन के लिए  लघु गेह । 

क्रमश:

प्रथम सर्ग --        भाग - १ / भाग –२

द्वितीय  सर्ग  --- भाग -- १ / भाग -- २ / भाग -- ३ 


तृतीय सर्ग  ---    भाग -- १ /भाग -२


चतुर्थ सर्ग ---- भाग -१    / भाग -२  / भाग - ३ /भाग -४ /भाग - ५ /भाग –6 






7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति दी.........
    वक्त लगता है मगर समझ कर आनंदित होती हूँ...

    सादर.

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  2. जीवन का कुरुक्षेत्र ...
    बहुत सुन्दर. आभार.

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  3. छात्र के रूप में कुरुक्षेत्र पढ़ी थी... फिर से पढना अच्छा लगा...

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  4. है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार ,
    पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार ।
    भोग - लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम ,
    बह रही असहाय नर की भावना निष्काम ।

    यह हर युग की त्रासदी रही है ...बहुत सुन्दर वर्णन !!!!

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  5. jiwan ka path padhati bahut bahut sunder margdarshan deti kriti ki prastuti k liye bahut aabhari hun.

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