बुधवार, 6 जुलाई 2011

खिड़की एकाएक खुली

अज्ञेय की कविता :अज्ञेय

खिड़की एकाएक खुली

खिड़की एकाएक खुली,

बुझ गया दीप झोंके से,

हो गया बन्द वह ग्रन्थ

जिसे हम रात-रात

घोखते रहे;

 

पर खुला क्षितिज, पौ फटी,

प्रात निकला सूरज, जो सारे

अन्धकार को सोख गया।

 

धरती प्रकाश-आप्लावित !

हम मुक्त कण्ठ

मुक्त-हृदय

मुग्ध गा उठे

बिना मौन को भंग किये।

 

कौन हम ?

उसी सूर्य के दूत

अनवरत धावित।

11 टिप्‍पणियां:

  1. शुक्रिया ,मनोज भाई .इस क्रम को ज़ारी रखिए.
    कौन हम उसी सूर्य के दूत ,
    अनवरत ,
    धावित .

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  2. सृष्टि चक्र में सृंग और गर्त, दिन और रात्रि के युiग्म तो आते ही रहते हैं. गिर के उठ जाना, अँधेरे से निकल कर प्रभात को हून्ध लेना और लाभ उठाना. यही तो मानव का पुनीत कर्म और धर्म है. अज्ञेय जी की लेखनी ने इसको ओजस्वी भाषा में बयां किया जिसे आपने हम सब तक पहुचाया. आभार इस प्रस्तुति के लिए.

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  3. खिड़की एकाएक खुली,
    बुझ गया दीप झोंके से,
    हो गया बन्द वह ग्रन्थ
    जिसे हम रात-रात
    घोखते रहे;

    अस्तित्ववादी दर्शन से प्रभावित कवि अज्ञेय जीवन को रहस्यमयी ढंग से अभिव्यक्त करते हैं .....इस रचना में भी उसी भाव की सृष्टि हुई है .....आपका आभार इस क्रम को जारी रखने के लिए ..!

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  4. अज्ञेय जी की सुंदर और गूढ़ रचना .के लिए आपका आभार और उनकी लेखन को नमन ...

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  5. कौन हम ?

    उसी सूर्य के दूत

    अनवरत धावित।

    अज्ञेय जी की सुन्दर रचना पढवाने के लिए साधुवाद

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  6. कौन हम ?

    उसी सूर्य के दूत

    अनवरत धावित।
    aabhar ..is prayas ke liye.

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  7. वाह अज्ञेय जी की रचना.आभार यहाँ पढवाने का.मुझे कृपया इस शब्द का मतलब बता दें.
    घोखते =?

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  8. @ शिखा जी,
    घोखना से बना है। इसका अर्थ होता है = बार-बार याद करना, रटना।
    हम लोग छुटपन में उत्तर घोख लेते थे।

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  9. अज्ञेय जी की इतनी गूढ कविता पढवाने के लिये आभार्।

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