गुरुवार, 28 जुलाई 2011

अकाल और उसके बाद


बाबा नागार्जुन की कविताएं - 3
30 जून 1911 - 5 नवंबर, 1998


अकाल और उसके बाद

कई  दिनों  तक  चूल्हा  रोया,  चक्की रही उदास
कई दिनों तक  कानी  कुतिया  सोई  उनके  पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई  दिनों  तक  चूहों की भी हालत रही शिकस्त

दाने  आए  घर  के  अंदर  कई  दिनों  के  बाद
धुआँ उठा आँगन  से  ऊपर  कई  दिनों  के  बाद
चमक  उठी  घर  भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए  ने   खुजलाई  पाँखें  कई  दिनों  के  बाद।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बाबा नागार्जुन द्वारा रचित कविता शायद 1952 में लिखी गयी थी। इन आठ पंक्तियों में बाबा ने अकाल और उसके बाद उत्पन्न गृहस्थ जीवन की बिषम परिस्थितियों को तदयुगीन सामाजिक पृष्ठभूमि को ध्यान में ऱखते हुए अपनी पूर्ण समग्रता में चित्रित किया है। यह सर्वमान्य सत्य है कि अकाल के बाद किसी के घर में चूल्हा जलना एक आशचर्यजनक बात है। अकाल के दिनों में मनुष्य ही नही अपितु पशु,पक्षी तक भी इसके प्रभाव से वंचित नही रह जाते। बाबा की रचना पढवाने के लिए आपका विशेष आभार।
    धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बाबा नागार्जुन द्वारा रचित कविता शायद 1952 में लिखी गयी थी। इन आठ पंक्तियों में बाबा ने अकाल और उसके बाद उत्पन्न गृहस्थ जीवन की बिषम परिस्थितियों को तदयुगीन सामाजिक पृष्ठभूमि को ध्यान में ऱखते हुए अपनी पूर्ण समग्रता में चित्रित किया है। यह सर्वमान्य सत्य है कि अकाल के बाद किसी के घर में चूल्हा जलना एक आशचर्यजनक बात है। अकाल के दिनों में मनुष्य ही नही अपितु पशु,पक्षी तक भी इसके प्रभाव से वंचित नही रह जाते। बाबा की रचना पढवाने के लिए आपका विशेष आभार।
    धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अकाल के बाद की स्थिति को कितने सरल शब्दों में गहन भाव हुए लिख दिया है .. इस प्रस्तुति के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. नागर्जुन की यह कविता जिंदा कविता है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आप को साधुवाद।मेरी पिर्य रचना है।बहुत बहुत धऩयवाद

    उत्तर देंहटाएं
  7. Even today when there is no Famine ,Farmers commit suicides for Economic hardships unpaid loans and failure to get adequate returnson the crops each year But today No one Writes such heartbreaking tales of poor peasants in Our Bharat which has become India Even poets have become Darbari singing praises for leaders ignoring Poor Peasant People and their plights Sycophancy ka bol bala hai

    उत्तर देंहटाएं

आप अपने सुझाव और मूल्यांकन से हमारा मार्गदर्शन करें