शनिवार, 9 जुलाई 2011

चीनी चाय पीते हुए

अज्ञेय की कविता-4

चीनी चाय पीते हुए

चाय पीते हुए

मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।

 

आपने कभी

चाय पीते हुए

पिता के बारे में सोचा है?

 

अच्छी बात नहीं है

पिताओं के बारे में सोचना।

 

अपनी कलई खुल जाती है।

 

हम कुछ दूसरे हो सकते थे।

पर सोच की कठिनाई है कि दिखा देता है

कि हम कुछ दूसरे हुए होते

तो पिता के अधिक निकट हुए होते

अधिक उन जैसे हुए होते।

 

कितनी दूर जाना होता है पिता से

पिता जैसा होने के लिए!

 

पिता भी

सवेरे चाय पीते थे

क्या वह भी

पिता के बारे में सोचते थे --

निकट या दूर?

9 टिप्‍पणियां:

  1. चाय पीते हुए पिता के निकट या पिता जैसा होने की इच्छा .. अच्छी प्रस्तुति

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  2. बहुत गहरा सन्देश है इस कविता में.

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  3. बहुत ही अच्छी प्रस्तुति ||
    बधाई ||

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  4. मनोज जी सुन्दर रचना अज्ञेय जी की-हमने तो नहीं सोचा था अब सोचना होगा आगे
    -
    कितनी दूर जाना होता है पिता से

    पिता जैसा होने के लिए!

    शुक्ल भ्रमर ५

    उत्तर देंहटाएं

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