गुरुवार, 28 जुलाई 2011

छायावादी गीति काव्य की प्रेरणा भूमि

छायावादी गीति काव्य की प्रेरणा भूमि

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आज छायावाद के इतिहास की बात शुरु करते हैं.  परंतु छायावाद के इतिहास को जानने से पहले गीति काव्य के बारे में जनना उचित होगा.  संक्षिप्त रूप से पहले गीति काव्य की पृष्ठभूमी की बात करते हैं .

गीतिकाव्य का इतिहास

यह तो हम सभी जानते हैं कि गीति काव्य को ही काव्य का सबसे प्राचीन रूप माना जाता है. हमारे वेदों में भी एक ऐसा वेद 'सामवेद' है जिसका गायन होता है. गीत शब्द का अर्थ भी गाये जाने से ही है.

बौद्ध साहित्य कि थेर गाथाओं में भी गीति काव्य के दर्शन मिलते हैं. 'मेघदूत' को भी अधिकाँश विद्वान गेय काव्य ही मानते हैं. संस्कृत साहित्य में गीति काव्य अपने वास्तविक रूप में 'गीतगोविन्द' में प्राप्त होता है. जयदेव के इस काव्य का हिंदी साहित्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई पड़ता है. विद्यापति और चंडीदास दोनों कवियों ने जयदेव की शैली को  ऐसा आत्मसात किया जिससे काव्यरस और संगीत रस के मिश्रण से गीतकारों के सम्मुख हिंदी गीतों का एक आदर्श  रूप सामने आया.

कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, मीरा

 

इसके बाद कबीरदास के रहस्यगीत बहुत लोकप्रिय हुए जिन्होंने खुद को अपने राम की बहुरिया बना कर विरह और मिलन सम्बन्धी गीतों का ऐसा राग फूंका कि आज तक जनता को तड़पाता और आह्लादित करता है.

कबीर के बाद सूरदास, तुलसी और मीरा आदि वैष्णव भक्तों के गीति काव्यों में रागात्मक तत्वों की प्रधानता पायी जाती है. विद्यापति के सामान सूर के पदों पर भी 'गीतगोविन्द' का प्रभाव स्पष्ट झलकता है.  सूर के गीति काव्य में रतिभाव के तीनों प्रबल और प्रधान रूप - भगवद्विशयक रति, वात्सल्य और दाम्पत्य रति - प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं.

तुलसीदास की गीतावली में भी भावों की व्यंजना उसी रूप में हुई है जिस रूप में मनुष्य को उनकी अनुभूति हुआ करती है या हो सकती है.

मीरा ने विरहिणी के रूप में जिन पदों में आत्मनिवेदन किया है वे निजत्व की पराकाष्ठा तक पहुँच गये हैं. मीरा के विरह से आहत हृदय को जब कसक और वेदना विक्षिप्त बना देती है उसकी मनोदशा का कोई पारखी नहीं मिलता.

हरिश्चंद्र युग

 

इन सब के बाद हरिश्चंद्र युग की शुरुआत हुई. इस काल में गीति काव्य की दो धारायें हो गयी.

१. आत्मनिवेदन शैली

२. राष्ट्रीय शैली

भारतेंदु की 'चन्द्रावली' में प्रथम शैली और 'भारत दुर्दशा' में दूसरी शैली स्पष्ट झलकती है.

द्विवेदी युग -

राष्ट्रीय गीत ' जय जय प्यारा भारत देश' श्री धर पाठक जी के गीत से सारा हिंदी प्रदेश गूँज उठा. इस युग के मैथिलीशरण गुप्त जी के राष्ट्रीय गीतों का अधिक प्रचार हुआ. 

बाबु गुलाब राय जी का मत था कि गुप्त जी ने चार प्रकार के गीतों का प्रणयन किया ;

१. छायावादी  २. आह्लादसूचक  ३. वेदनासूचक ४. नारी-गौरव सूचक.

छायावादी गीति काव्य की प्रेरणा भूमि

द्विवेदी युग में गीति काव्य की दो प्रमुख धाराएँ थी :

१. भारतीय परंपरावादी

२. परिवर्तनवादी

महावीर प्रसाद द्विवेदी प्रथम धारा के समर्थक थे, और नवयुवक  कवियों मे मुकुट धारी, प्रसाद, पंत, निराला आदि द्वितीय धारा के परिपोषक थे. परंपरावादियों की रूढ़िवादिता और हिन्दी के प्रति अँग्रेज़ीदानों की उपेक्षा के थपेड़ो से ऊबकर नवयुवक वर्ग कोई नया मार्ग ढूँढने को व्यग्र हो रहा था.  इसी काल मे बंगाल का एक भारतीय अपनी ही भाषा और अपने ही परिचित विचारों के बल से काव्य के विशाल मंदिर में विश्व के दिग्गज विद्वानों द्वारा सम्मानित किया जा रहा था. उसकी कविता ने भारतीय भाषा प्रेमियों को उस तिमिराच्छन्न काल मे आशा की वह ज्योति दिखाई जिसकी ओर निराश हृदय नवयुवक दौड़ पड़े. रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाए बड़ी रूचि के साथ  पढ़ी जाने लगीं. गुप्त बंधु और सुमित्रा नंदन पंत  ने यह स्वतः स्वीकार किया है कि उन पर रवीन्द्रनाथ की रचनाओं का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है.

पंत जी का मत है कि - पूर्व में उपनिषदों के दर्शन के जागरण की आभा को पश्चिम की यंत्र युग की सभ्यता सौंदर्य बोध से दूषित कर कवीन्द्र रवीन्द्र ने सर्व-प्रथम छायावाद की भावना को जन्म दिया.

इतिहास साक्षी है कि ईसा की बीसवीं शताब्दी लगते लगते स्कूलों और कालेजों में अँग्रेज़ी साहित्य की शिक्षा का प्रचार व्यापक बन गया था. परिणाम-स्वरूप अँग्रेज़ी काव्य का प्रभाव हिन्दी कविता की गतिविधि पर पड़ने लगा. नंददुलारे वाजपेयी का मत है कि इसका सबसे अधिक प्रभाव हिन्दी की उस काव्यधारा पर पड़ा जो थोड़ी अधिक भाव-प्रवणता लिए उद्भासित  हुई. इस स्वच्छंदतावादी  काव्य प्रवृति में उत्तर  भारत की परिवर्तन शील सामाजिक स्थितियाँ मुख्य रूप से कारण बनीं थी.

इन सब कारणों से छायावादी कविता का जन्म हुआ. जन्मकाल मे इसका रूप कई आचार्यों को इतना विकृत प्रतीत हुआ कि वे इसका जन्म - देश और जाति के लिए अमंगलकारी मानते थे. आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने एक बार खीजकर लिखा : छायावादियों की रचना तो कभी समझ में भी नही आती. ये लोग बहुधा बड़े ही विलक्षण छंदों या वृतों का भी प्रयोग करते हैं. कोई चौपदे लिखते हैं, कोई छःपदे, कोई ग्यारह पदे, कोई तेरह पदे  ! किसी की चार सतरें गज गज भर लंबी तो दो सतरें दो ही दो अंगुल की. फिर ये लोग बेतुकी पद्यावलि भी लिखने की बहुधा कृपा करते हैं. इस दशा में इनकी रचना एक अजीब गोरख धंधा हो जाती है. न ये शास्त्र की  आज्ञा के कायल, न ये पूर्ववर्ति कवियों की प्रणाली के अनुवर्ती ; न ये समालोचकों के परामर्श की परवाह करनेवाले. इनका क्या इलाज हो सकता है, कुछ समझ में नहीं आता.

छायावाद की प्रयोगावस्था -

छायावादी  कविता अपने आरंभिक काल में स्वच्छंदतावाद के समीप पहुँचती है और परिपक्वावस्था में रहस्यवाद का दर्शन कराती है. सन 1850 से 1912 तक की हिन्दी कविताओं पर अँग्रेज़ी की स्वच्छंदतावादी काव्य प्रवृति के अपरिपक्व रूप का प्रभाव झलकता है, किंतु सन 1913 से 20 तक का समय ऐसा प्रतीत होता है मानो हिन्दी कवियों की स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति परिपक्व और प्रगाढ़ बनती हुई छायावाद की विशिष्ट काव्यशैली के रूप में परिवर्तित और परिणत होती जा रही है.

अगला भाग अगले वृहस्पतिवार को …

                                                                                                                                                       क्रमशः

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उपयोगी जानकारी उपलब्ध करवाई…………आभार्।

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  2. ज्ञानवर्द्धक आलेख...इसे भी देखें- http://shalinikikalamse.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

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  3. काफी कुछ नया जानने को मिल रहा है स माध्यम से ...

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  4. bahut umda aalekh.... is vishay par aur bhi gambhir charcha ho sakti thee... jaise angrezi kavita me renaissance ka daur aayaa tha waise hee chhayavaad ka yug tha hamare yahan....

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  5. जानकारी का पुनार्वलोकन करवाने के लिए धन्यवाद.

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  6. सरल भाषा में लिखा सुन्दर आलेख। साधुवाद।

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  7. आपके द्वारा प्रस्तुत ' छायावादी गीति काव्य की प्रेरणा भूमि ' अच्छी तगह से पढा। इस पर अगले वृहस्पतिवार को अपनी प्रतिक्रिया के साथ सज -धज कर आने की कोशिश करूँगा क्योंकि अभी इस संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए आपका अगला पोस्ट देखना जरूरी है। आपका प्रयास अच्छा लगा। धन्यवाद।

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  8. आपने बहुत ही विस्तार से इस विषय पर प्रकाश डाला है। बहुत कुछ नया सीखने को मिला।

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  9. सभी सुधीजनों का आभार जो अपनी मूल्यवान टिप्पणियाँ दी.

    गाफिल जी आप द्वारा दिया गया लिंक मैंने पढ़ लिया है. इस लिंक को देने के लिए आभारी हूँ.

    प्रेम सरोवर जी बहुत ज्यादा सज धज कर ना भी आये तो चलेगा :) वर्ना मुझे भी अपनी सजावट के प्रति सजग होना पड़ेगा, जो की मुश्किल है. :):):)

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  10. सरल शब्दो मे सजी हुई इस जानकारी को पढ़ कर बार बार आने की उत्कंठा रहेगी |

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  11. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. सहेजने योग्य जानकारी लिए उम्दा पोस्ट......

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