गुरुवार, 7 जुलाई 2011

समालोचना के गुण

समालोचना के गुण

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nअनामिका

पिछले बुधवार मैंने आलोचना और समालोचना की परिभाषा बताते हुए उसके प्रकारों पर लेख प्रस्तुत किया था.  आज आपके सम्मुख समालोचना के गुण प्रस्तुत कर रही हूँ...कोई गलती हो तो क्षमा चाहूंगी.

समालोचना के गुण

A perfect judge will read each work of wit.

With the same spirit that is author writ.    - A. Pope

१. काव्य की आत्मा में प्रवेश - आलोचक का सबसे प्रधान गुण कवि या काव्य की आत्मा में प्रवेश करने की उसकी क्षमता होती है. जिस भाव-भंगिमा, मुद्रा और तन्मयता के साथ कवि ने अपने काव्य की रचना की हो, उसमे प्रवेश कर जानेवाला पाठक ही उस कवि का सच्चा आलोचक हो सकता है.

२. संपूर्ण काव्य का अध्ययन - इसके लिए आवश्यक है कि कवि के संपूर्ण काव्य का अध्ययन किया जाये. काव्य के अंग - विशेष के अध्ययन पर ही आलोचक को अपनी धारणा नहीं बना लेना चाहिये.

३. कवि के ध्येय की परख - कवि का क्या ध्येय है इस पर पहले ही दृष्टि रखनी चाहिये. उसके लक्ष्य और मन्तव्य को पूरी तरह ग्रहण करने के बाद ही अपनी आलोचना अग्रसारित करनी चाहिये.

४. नूतनता ही कला की कसौटी नही - लेकिन नवीन मत देना ही सच्ची आलोचना नही. उसमे तत्व होना चाहिये. वह तथ्य पर आधारित होना चाहिये. उसमे अपनी ही सच्ची अनुभूति की पृष्ठ-भूमि हो - यह आवश्यक है.

५. दलगत भावना का त्याग - आलोचना सदा कवि के कृतित्व   को आधार मानकर होनी चाहिये, न कि केवल उसके व्यक्तित्व को. प्रायः देखने में आता है कि साहित्यिक वर्ग विशेषो में बंट जाया करते हैं ; और वे कवि की कृति से प्रभावित होकर नही वरन दलगत भावनाओ से प्रेरित होकर आलोचना करते हैं.

६, अहम्मन्यता का निषेध - सच्ची समीक्षा में अहमंधता का निषेध होना चाहिये अर्थार्थत्‌ समीक्षा में अपने अहम को स्थान नही देना चाहिये. अपनी इच्छाओं और भावनाओं को प्रदर्शित करने का प्रयास न किया जाय तो अच्छा हैं. प्राय आलोचना के समय विद्वान अपने कार्य Do's & Dont's को ध्यान में रखकर कवि की आलोचना करते हैं. इससे भ्रांति की आशंका हो सकती है.

७. भाषा के मानदंड नही - भाषा के लालित्य को ही समीक्षा का मानदंड नही मानना चाहिये.  भाषा वही है जो भावो को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर सके. ललित और भारी भरकम शब्दो का प्रयोग ही अच्छी भाषा के लक्षण नही. अतः उनके लोभ में न आना चाहिये. यदि विचार स्पष्ट होंगे, तो भाषा आपने आप सुंदर और ललित होगी.

८. तार्किकता और संगति - आलोचना में संगति का होना परमावश्यक है. समीक्षक के मत में तार्किकता होनी चाहिये. उसे सदा ध्यान रखना चाहिये कि आदि से अंत तक उसके मत का खंडन हो रहा है अथवा नही. सर्वोत्तम, उच्चतम आदि अतितिशियोक्तिपूर्ण शब्दो का यथासंभव  निषेध करना चाहिये. इसके लिए आवश्यक है कि समीक्षक में गहन अध्ययन हो, ज्ञान हो, न्याय हो और वह सदा 'सत्य' का ही पक्ष ले.

20 टिप्‍पणियां:

  1. समालोचना को बिलकुल सही ढंग से प्रस्तुत किया है आपने

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  2. Bahut badhiya Anamika!Tumhara gahan adhyayan dikhata hai ye aalekh!

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  3. जिस भाव भंगी मुद्रा और तन्मयता के साथ कवि ने अपने काव्य की रचना की हो, उसमे प्रवेश कर जानेवाला पाठक ही उस कवि का सच्चा आलोचक हो सकता है.
    bahut hi mulywan hain ye pangtiyan.....

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  4. आलोचना 'साबुन' की तरह काम करती है.एक स्वस्थ तटस्थ रह कर की गई आलोचना हमेशा 'इम्प्रूव' करती है.किन्तु लोगों ने इसे 'आलू चना' बना दिया है.हा हा हा हिंदी में एम.ए. कर रही हो क्या?

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  5. समालोचना के सही सार्थक गुण बताये हैं ... शुक्रिया

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  6. ---सटीक व सार्थक आलेख...परन्तु...
    "A perfect judge will read each work of wit.

    With the same spirit that is author writ. " - A. Pope

    १-राजभाषा हिन्दी के आलेख के लिए --अंग्रेज़ी व पोप का उदाहरण गलत है...हिन्दी शास्त्रज्ञों व शास्त्रीय ग्रंथों का उदाहरण देना चाहिए, अंग्रेज़ी उदाहरण से विश्वशनीयता कैसे होगी?.. आजकल शिक्षा संस्थाओं के अद्यापक ..हिन्दी भाषा व साहित्य में अंग्रेज़ी के तत्वों का काफी प्रयोग करने लगे हैं जो एक गलत परम्परा है व उनके स्वभाषा के शास्त्रीय ज्ञान पर प्रश्न चिन्ह लगाता है |
    २- "- इसके लिए आवश्यक है कि कवि के संपूर्ण काव्य का अध्ययन--"--क्या किसी कवि के सम्पूर्ण काव्य का अध्ययन किसी के लिए संभव है ...फिर सम्पूर्ण काव्य पर समालोचना का अर्थ पुनः वही होगा कि कवि किस भाव का किस विषय का किस वर्ग का है ....कवि की समालोचना के लिए तो यह आवश्यक है ...किसी ग्रन्थ या रचना की समालोचना के लिए नहीं |

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  7. डा. गुप्ता जी शुक्रिया आप ने अपनी टिप्प्णी द्वारा इस लेख का मान बडाया. आपकी बात से सहमति रखती हुँ कि अन्ग्रेजी के कवि के उदाहरण देने मे कोताहि होनी चाहिए...हाँ लेकिन मेरे ख्याल से गलत तो नहि है. आगे से ध्यान रखुँगी.

    सभी टिप्प्णीकारों की भी आभारी हूँ, जिन्होंने यहाँ आकर अपनी राय दी.

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  8. राजभाषा हिन्दी किसी अन्य भाषा से दुराग्रह नहीं रखती। इसकी नीति ही है कि सभी भाषा के प्रति सम्मान के साथ सरकारी काम काज में हिन्दी को अपनाना।
    साहित्य में भी पाश्चात्य काव्यशास्त्र की चर्चा होती है।
    आपने एक बहुमूल्य जानकारी प्रदान की।

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  9. क्षमा काहे को मांगती हैं....आसान तरीके से आपने बता दिया है कि हम बड़े आलोचक हैं और साथ ही सच्चे भी। आलोचना विषय की ही करते हैं...व्यक्ति की आलोचना के आधार पर नहीं....। वो तो अलग ही करते हैं....फिर से धन्यवाद...

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  10. ज्ञानवर्धक एवं सार्थक आलेख ! इतनी महत्वपूर्ण जानकारी देने के बहुत बहुत आभार !

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  11. बहुत अच्छा ज्ञानवर्धक लेख |
    आशा

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  12. ये सच है इन मानदंडों को ख्याल में रख कर करी जाने वाली समीक्षा/आलोचना/समालोचना ... सार्थक और सही मायने में आलोचना है ...

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  13. आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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  14. सार्थक और ज्ञानवर्धक आलेख. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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