रविवार, 10 जुलाई 2011

तन गई रीढ़

बाबा नागार्जुनbaba Nagarjun 2

30 जून 1911 - 5 नवंबर, 1998

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झुकी पीठ को मिला

किसी हथेली का स्पर्श

तन गई रीढ़

 

महसूस हुई कंधों को

पीछे से,

किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें

तन गई रीढ़

 

कौंधी कहीं चितवन

रँग गए कहीं किसी के होंठ

निगाहों के ज़रिए जादू घुसा अंदर

तन गई रीढ़

 

गूँजी कहीं खिलखिलाहट

टूक-टूक होकर छितराया सन्नाटा

भर गए कर्णकुहर

तन गई रीढ़

 

आगे से आया

अलकों के तैलाक्त परिमल का झोंका

रग-रग में दौड़ गई बिजली

तन गई रीढ़

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ... सच है किसी अपने का साथ मिल जाये तो जोश भर जाता है ..

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  2. चरण स्पर्श बाबा नागार्जुन के!! इस कविता का मर्म ह्रदय से महसूस किया जा सकता है!!

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  3. बाबा से सुने हैं ये कविता धनबाद में १ अप्रैल १९९१ को. उनकी प्रिय कविताओं में एक है यह...

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  4. वाह बहुत सुंदर. अद्वितिय.

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  5. आगे से आया

    अलकों के तैलाक्त परिमल का झोंका

    रग-रग में दौड़ गई बिजली

    तन गई रीढ़

    कविता बहुत अच्छी लगी।
    बाबा नागार्जुन को विनम्र श्रद्धंजलि।

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  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (11-7-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  7. kisi ka sparsh aur sath hone bhar ka ehsaas hi kitni sfurti bhar deta hai. sunder chitr kheencha hai.

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  8. जबरदस्त ... कमाल की प्रस्तुति है मनोज जी ... बाबा की कवितायें अनोखी होती हैं ... अलग अंजाद लिए ...

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