गुरुवार, 21 जुलाई 2011

भारतीय साहित्य का स्वरुप 1942 के बाद ...... (भाग - 2)

भारतीय साहित्य का स्वरुप 1942 के बाद...... (भाग - 2)

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साहित्य का उभरता नया रूप  -   विगत  तीन दशकों में हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाएँ उन्नत हो चुकी  हैं. परन्तु आलोचना तथा कथा साहित्य के क्षेत्र में जितना काम हुआ उतना अन्य क्षेत्रों में नहीं हो पाया है. इन तीन दशकों में कविता, नाटक, संस्मरण, रेखा चित्र, आत्मकथा, जीवन चरित आदि के क्षेत्र में काम कम हुआ. इस समय प्रकाशक आलोचना और उपन्यास छापने के लिए तो तुरंत तैयार हो जाते थे, परन्तु कविता अथवा नाटक प्रकाशित करने में आनाकानी  करने लगते थे. इसका कारण जनता की मांग तथा कविता और नाटक के स्तर का हीन और लोकप्रिय न होना भी माना जा सकता है.  प्रसाद, निराला, पन्त आदि के कविता संग्रहों की वर्तमान में भी मांग है, परन्तु नवीन कवियों के कविता संग्रहों को कोई भी खरीद कर नहीं पढना चाहता. प्रेमचंद के युग का कथा-साहित्य आज भी उतना ही लोकप्रिय है, जितना की पूर्व में था. कथा साहित्य के प्रति जनता के हृदय में एक सहज आकर्षण है. 

पिछले कुछ वर्षों में बड़े सुंदर जीवन चरित्र, आत्मचरित्र, निबंध आदि लिखे गए हैं, जो स्तर की दृष्टि से श्रेष्ठ और भव्य हैं. विगत कुछ वर्षों में हिंदी साहित्य में एक नया परिवर्तन होना आरम्भ हुआ है. अब साहित्यकार वादों का मोह त्याग जन-जीवन के साथ घनिष्ठतर होने का प्रयत्न  करने लगे हैं.

व्यापक शोधकार्य - अनुसंधान  के क्षेत्र में अब बहुत काम हुआ है. हमारे विश्व-विद्यालयों ने इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया है. भाषा शास्त्र, भाषा सम्बन्धी समस्याओं की समीक्षा के नवीन एवं प्राचीन सिद्धांतों तथा समस्याओं, मध्य एवं श्रृंगार कालीन साहित्य के नवीन मूल्यांकन, हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ में रचित साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन आदि के क्षेत्र में बहुत काम हुआ है. सरकार एवं विभिन्न संस्थाएं विद्वानों को शोध कार्य में दक्षता प्राप्त करने के लिए विदेश भेज रही है.

अभूतपूर्व विस्तार और विविधता - साहित्य के हर क्षेत्र में नवीन उत्साह और नवीन लगन है.  हिंदी विरोधी आन्दोलनों से हिंदी संसार सतर्क हो उठा था. यह विरोध धीरे धीरे शांत होता जा रहा है. आज प्रत्येक हिंदी प्रेमी को इस बात की चिंता है कि भारतीय समृद्ध बने. अभी विस्तार का युग है, आगे चलकर गहराई भी आएगी, पुरानी मान्यताएं टूटती जा रही हैं. उनके पोषकों की आवाज़ भी क्षीण होती जा रही है. प्रगति के इन क्षणों में प्राचीन मान्यताओं से चिपके रहना बड़ा घातक होगा. नवीन दृष्टिकोण कहीं आकाश से नहीं आ टपकता . उसकी उत्पत्ति जीवन की प्रतिपल बदलती रहने वाली स्थितियों और उनके कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं से होती है. आज का हिंदी साहित्य नवीन समस्याओं  के प्रति सजग है. संभवतः हिंदी साहित्य के सम्पूर्ण इतिहास में ऐसा समय कभी नहीं आया जिसमें इतना विस्तार और इतनी विविधता आई हो. स्वस्थ और अस्वस्थ दोनों ही प्रकार के दृष्टिकोण हमारे सामने आ रहे हैं, परन्तु समय की प्रगति अस्वस्थ का विनाश कर स्वस्थ को आगे बढाती चली जा रही है. प्रयोगवाद जैसा विनाशकारी एवं अस्वस्थ दृष्टिकोण अब प्रायः नष्ट हो चुका है.

उज्जवल भविष्य की झलक - संक्षेप में हिंदी साहित्य की वर्तमान प्रगति पर्याप्त शक्तिशाली, बहुमुखी व्यापक एवं संतोषजनक है. उमड़ती हुई नदी की धारा में कूड़ा - करकट भी बहता चला जाता है, परन्तु समय का प्रभाव इस गंदगी को दूर कर नदी की धारा को पुनः  स्वच्छ एवं निर्मल बना देता है इसलिए हमें साहित्य की वर्तमान धारा में उत्पन्न विकृतियों से अधिक आशंकित नहीं होना चाहिए. जैसे समय ने 'हालावाद' को समाप्त कर दिया था, वैसे ही समय 'प्रयोगवाद' जैसे विकृत दृष्टिकोण को भी समाप्त कर साहित्य की धारा को निर्मल बना देगा. क्यूंकी विकृति कभी भी अधिक समय तक नहीं टिक पाती और अब तो प्रयोगवाद भी इतिहास की वस्तु बन चुका है.

आज परिवेश चित्रण साहित्य की अनिवार्य प्रतिबद्धता स्वीकार की जाने लगी है. क्यूंकि साहित्यकार वर्तमान में जीवित रहना चाहता है और यथार्थ दर्शन में अपनी आस्था रखता है, पर क्या परिवेश या वस्तु का साहित्य में यथार्थ दर्शन हो पाया है. वस्तुतः दृष्टा की वस्तु दर्शन की प्रतिक्रिया को ही यथार्थ मान लिया जाता है. सत्य तो बाह्य रूप से भिन्न है जिसका अन्वेषण अभी बाकी है. कवि  चंद्रमा को सुन्दरतम मानता है और अनिन्द्या  सुंदरी के मुख की उपमा उससे दे कर विभोर हो उठता है, पर क्या वास्तव में चंद्रमा सुन्दर है ? क्या उसकी किरणें शीतल हैं ? चन्द्रमा का सौन्दर्य कवि- मानस की सृष्टि है, उसकी किरणों की शीतलता या ताप दृष्टा की मानसिक स्थिति के परिणाम हैं. कहने का आशय यह है कि साहित्य में वस्तु या परिवेश का चित्रण यथार्थ न हो कर प्रतिक्रियात्मक होता है. दृष्टा उनसे जिस रूप में प्रभावित होता है, उसे ही अंकित करता है. ऐसी स्थिति में साहित्य वस्तुगत न होकर आत्मगत अभिव्यक्ति ही है.

वर्तमान हिंदी साहित्य में निराशा, कुंठा, घुटन आदि नकारात्मक भाव या विचार शब्दायित हो रहे हैं. वे भारत के व्यापक परिवेश के चित्रण नहीं हैं. आज भारतीय प्रत्येक परिस्थिति में आशान्वित रहना चाहता है, क्यूंकि वह किसी परिस्थिति को स्थायी नहीं मानता. 'जगत' शब्द गति का ही द्योतक है. प्रकृति में कृष्ण पक्ष के उपरान्त शुक्ल पक्ष का आगमन होता है. भारतीय इस सत्य में आस्था रखता है और जीवन के कृष्ण पक्ष को अस्थायी मानकर सहज रूप से ग्रहण करता है. कुंठा, घुटन आदि किसी विचार अथवा आवेग के बलपूर्वक दमन का नाम है. भारत विचार स्वातंत्र्य पर विश्वास करता आया है. समाज स्वास्थ्य कि दृष्टि से उसने व्यक्तिगत कुंठा अथवा घुटन को महत्त्व नहीं दिया. भारत ने 'हम' को महत्त्व दिया है 'मैं' को नहीं. यही आज आधुनिकता का मानदंड है और शुद्ध साहित्य सदा आधुनिक रहता है.

9 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञानवर्द्धक और सुन्दर आलेख...धन्यवाद अनामिका जी!

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. एक व्यवस्थित आलेख जिसमें कई महत्वपूर्ण विषय पर विस्तार से चर्चा की गई है।

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  4. "वर्तमान हिंदी साहित्य में निराशा, कुंठा, घुटन आदि नकारात्मक भाव या विचार शब्दायित हो रहे हैं. वे भारत के व्यापक परिवेश के चित्रण नहीं हैं."

    अनामिका जी,नमस्कार,
    भारतीय साहित्य का स्वरूप 1942 के बाद (भाग-2) में आपने जो प्रस्तुति की है,वह साहित्य -जगत के विभिन्न स्वरूपों को अपनी पूर्ण समग्रता में समावेशित किया है किंतु मैं आपके पोस्ट से उद्धृत उपर्युक्त उद्धरण से सहमत नहीं हूँ कि वर्तमान हिंदी साहित्य निराशा ,घुटन या नकारात्मक भाव-बोध से ग्रसित है। यह आपकी अपनी मान्यता हो सकती है। कृपया आत्ममंथन करें एवं इसे अन्यथा न लें। प्रस्तुति अच्छी लगी। धन्यवाद।

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  5. समय के साथ हिंदी अपना स्थान अवश्य पाएगी ! एक अच्छे लेख के लिए आभार !

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  6. गहन ज्ञान पूर्ण लेख ... अभी पूरी तरह से समझ नहीं पायी हूँ ...फिर से पढ़ना पड़ेगा ...

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  7. Bhaasha, sahity ke vikaas ki vistrat yaatra ... vibhinn dour se guzarta saahity apna sthaan jaroor bana leta hai ... aashavaadi hona hi achaa hai ...

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