रविवार, 31 जुलाई 2011

मानवीय मूल्यों के संस्थापक- प्रेमचंद


मानवीय मूल्यों के संस्थापक- प्रेमचंद

31 जुलाई 1880-8 अक्टूबर 1936           
                                        मनोज कुमार



आज उनका जन्मदिन है


धनपत राय उर्दू में नवाब राय के नाम से गल्प लिखते थे। वतन-परस्ती के ज़ज़्बे से लबरेज़ थे। पांच कहानियों का संकलन 'सोज़े-वतन' 1909 में प्रकाशित हुआ। ब्रिटिश सरकार ने इसे ख़तरनाक माना। प्रेमचंद पर ‘सिडीशन’ का आरोप लगा। बरतानि हुकूमत को 'सोज़े-वतन' हज़म नहीं हुई और इसकी हज़ारों प्रतियां जला दी गईं। संबद्ध ब्रिटिश अधिकारी ने चेतावनी देते हुए कहा था, “आगे से ऐसा कुछ भी करने की ज़ुर्रत न करना। तुम ब्रिटीश अमलदारी में हो, नहीं तो इस ज़ुर्म के लिए तुम्हारा हाथ कलम कर दिया जा सकता था।” 'सोज़े-वतन' क्या जली वतन को प्रेमचन्द मिल गया।

‘सोज़ेवतन’ की पांच में से चार कहानियां ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’, ‘शेख मखमूर’, ‘यही मेरा वतन है’, और ‘सांसारिक प्रेम और देश प्रेम’ उस समय की राष्ट्रीय चेतना के उभार को रेखांकित करती हैं। ये कहानियां भावना के स्तर पर देश और राष्ट्र प्रेम को प्रोत्साहित करने की कोशिश का परिणाम हैं।

1936 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था,
साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

इससे बढ़िया साहित्य की परिभाषा हो ही नहीं सकती। प्रेमचंद साहित्य को उद्देश्य परक मानते थे। प्रेमचंद के पहले हिन्दी उपन्यास साहित्य रोमानी, ऐयारी और तिलस्मी प्रभाव में लिखा जा रहा था। उन्होंने उससे इसे मुक्त किया और यथार्थ की ठोस ज़मीन पर उतारा। यथातथ्यवाद की प्रवृत्ति के साथ प्रेमचंद जी हिंदी साहित्य के उपन्यास का पूर्ण और परिष्कृत स्वरूप लेकर आए। उन्होंने अपनी रचनाओं में समाज की सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों को उजागर किया। शोषित, दलित और ग़रीब वर्ग को नायकत्व प्रदान किया। आम आदमी की घुटन, चुभन कसक को अपने कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने प्रतिबिम्बित किया। इन्होंने अपनी रचनाओं में समय को ही पूर्ण रूप से चित्रित नहीं किया वरन भारत के चिंतन आदर्शों को भी वर्णित किया है।

प्रेमचंद का साहित्य ग़रीब जनता का साहित्य है। उन्होंने जीवन को बहुत नज़दीक से देखा था। उनके उपन्यासों में निम्न और मध्यम श्रेणी के गृहस्थों के जीवन का बहुत सच्चा रूप मिलता है। इनकी कहानियों में पहली बार समाज का पूरा परिवेश उसकी कुरूपता, असमानता, छुआछूत, शोषण की विभिषिका, कमज़ोर वर्ग और स्त्रियों का दमन आदि वास्तविकता के साथ प्रकट हुई है। ग्रामीण जीवन को उन्होंने बिना किसी वाद की ओर देखे अपने उपन्यासों में चित्रित किया है। अपने पात्रों को ऐसा सजीव चित्र देते हैं कि पाठक की उससे सहानुभूति सहज ही प्राप्त हो जाती है। पुरुष-पात्रों के साथ-साथ उन्हें नारी-पात्र के चरित्र चित्रण में भी  सफलता मिली है। सच तो यह है कि समाज के सभी वर्ग के पात्रों का चरित्र अपने-अपने अनुरूप समान स्थान पाता है।

प्रेमचंद का जीवन औसत भारतीय जन जैसा है। यह साधारणत्व एवं सहजता प्रेमचंद की विशेषता है। प्रेमचंद दरिद्रता में जनमे, दरिद्रता में पले और दरिद्रता से ही जूझते-जूझते समाप्त हो गए। फिर भी वे भारत के महान साहित्यकार बन गए थे। उन्होंने अपने को सदा मज़दूर समझा। बीमारी की हालत में, मरने के कुछ दिन पहले तक भी अपने कमज़ोर शरीर को लिखने पर मज़बूर करते थे। कहते थे, मैं मज़दूर हूं! मज़दूरी किए बिना  मुझे भोजन का अधिकार नहीं है।

कलाकार जब वस्तु पर अपने भाव और विवेक का आरोप कर देता है और उसे अपने आदर्श के अनुकूल गढ़ता है तब उसका दृष्टिकोण आदर्शवादी बन जाता है। प्रेमचन्द की कहानियों में आदर्शवाद के बदलते रूप दिखाई देते हैं। ये समसामयिक युगबोध को स्पष्ट करते हैं। शुरु की कहानियों जैसे ‘बड़े घर की बेटी’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘नमक का दारोगा’, ‘उपदेश’, ‘परीक्षा’, ‘अमावस्या की रात’, ‘पछतावा’ आदि कहानियों में वे पूरी तरह से आदर्शवादी दिखते हैं। इनमें कर्तव्य, त्याग, प्रेम, न्याय, मित्रता, देश सेवा आदि की प्रतिष्ठा हुई है। बाद में आदर्शवाद यथार्थ में बदलता जाता है। ‘गोदान’, ‘प्रेमाश्रम’ ‘रंगभूमि’ जैसे उपन्यास और  ‘पूस की रात’, ‘ठाकुर का कुँआ’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘दूध का दाम’, ‘सद्गति’, ‘वज्रपात’ आदि में जीवन का नग्नतम यथार्थ उजागर होता है।

सामाजिक सुधार संबंधी भावना का प्रबल प्रवाह उन्हें कभी-कभी एक कल्पित यथार्थवाद की ओर खींच ले जाता है फिर भी उन्होंने कल्पना और वायवीयता से कथा-साहित्य को निकालकर उसे समय और समाज के रू--रू खड़ा करके वास्तविक जीवन के सरोकारों से जोड़ा। अपने जीवन काल में वे विभिन्न सुधारवादी और पराधीनता की स्थितिजन्य नव जागरण प्रवृत्तियों से प्रभावित रहे हैं, जैसे - आर्यसमाज, गाँधीवाद, वामपंथी विचारधारा आदि। लेकिन समाज की यथार्थगत भूमि पर उसकी सहज प्रवृत्ति में ये प्रवृत्तियाँ जितनी समा सकती है, उतनी ही मिलाते हैं, ठूस कर नहीं भरते। इसीलिए चित्रण में जितनी स्वाभाविकता प्रेमचन्द में देखने को मिलती है, अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदानमें तो यह अपनी पराकष्ठा पर पहुँच गई है।

प्रेमचन्द क्रांति नहीं, सुधार के समर्थक थे। हां यह ज़रूर है कि वे धीरे-धीरे आदर्शवाद और सुधारवाद के प्रभाव से मुक्त हो रहे थे। ‘गोदान’, ‘पूस की रात’ या ‘सादगी’ में यह बात दिखती है। बदली हुई परिस्थितियों में वे ख़ुद को बदल रहे थे। यदि प्रेमचन्द युग का आरम्भ 'सेवासदनमें है, तो उसका उत्कर्ष 'गोदानमें। इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय किसान की पतनशील स्थिति के लिए शोषकों के साथ-साथ सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और दुराग्रहों को जिम्मेदार माना है। उन्होंने बदलते हुए यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में चीज़ों को समझने का प्रयत्न किया है। छोटे व ग़रीब किसान की मज़दूर बन जाने की विवशता इस उपन्यास की उपलब्धि है। ‘गोदान’ किसान जीवन की त्रासदी का महाकाव्य है। भाग्यवाद ने किसान को यथास्थितिवादी होने के लिए मज़बूर कर दिया है। इस उपन्यास में प्रेमचंद आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। यह एक तरह से आदर्श और यथार्थ का मिलाजुला रूप है। प्रेमचंद ने प्रगतिवादी साहित्य को नयी दिशा दी जिसे आलोचकों ने ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ कहा है।

वे आदर्शों और विचारधाराओं को अपने पात्रों पर थोपते नहीं हैं, बल्कि अन्तमन या अन्तरात्मा की आवाज की तरह स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होने देते हैं। ‘सेवासदन’ के गांधीवादी प्रेमचंद गबन’ में मार्क्सवादी विचारधारा में ढलते दीखते हैं लेकिन गोदान’ तक आते-आते वामपंथ से भी उनका मोहभंग हो चुका है। जीवन के अंत में मृत्यु-शैय्या पर पड़े प्रेमचंद का जैनेन्द्र से यह कहना कि “अब आदर्श से काम नहीं चलेगा” शायद उनकी आशाओं और दृढ़ विश्वासों के स्खलन का सूचक है।

उनकी कहानियों में आदर्श और यथार्थ का अन्तर्द्वन्द्व है। हालाकि बाद की कहानियाँ समस्यामूलक रही हैं, किन्तु उन्होंने आदर्श समाधान प्रस्तुत करना बन्द कर दिया। यह उनकी रचनाओं में रिक्ति नहीं बनी, बल्कि ये वैचारिक मंथन के रूप में पाठकों को झकझोरने लगीं और ये रचनाएं अपने उत्कर्ष को प्राप्त करती अधिक प्रभावशाली साबित हुईं। पूस की रातऔर'कफनजैसी कहानियों में उनकी बदली हुई वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट देखा जा सकता है। उनकी बाद की कहानियाँ घटना प्रधान न होकर चरित्र प्रधान हैं जिनमें पात्रों की मनोवृत्तियों का वास्तविक चित्रण नितांत सहज रूप में देखने को मिलता है। उनका स्वयं कथन है - 'कोई घटना तब तक कहानी नहीं होती जब तक कि वह किसी मनोवैज्ञानिक सत्य को व्यक्त न करे।इस कथन से उनकी कहानियों में आए विकास को समझा जा सकता है। 'कफनकहानी उनके इस वैचारिक विकास का उत्कर्ष है। इसमें ग्रामीण कृषक की दुरावस्था का चित्रण है। किसानों की आर्थिक विपन्नता जमीदारों - साहूकारों के शोषण का नतीजा नहीं है बल्कि यह आर्थिक विषमता मूलक समाज की संरचना है। यह कहानी उस सामाजिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करती है जो मनुष्य के जिन्दा रहने पर उसका शोषण होने देती है और मर जाने पर खोखली नैतिकता का जामा पहन उसके अंतिम संस्कार के लिए उपाय करती है, सहयोग करती है।
प्रेमचंद का व्यक्तित्व साधारण और व्यावहारिक था। साथ ही उनके जीवन के आदर्श भी प्रत्यक्ष और सुनिश्चित थे। अतएव उन्होंने व्यावहारिक धरातल पर ही आदर्शवाद की प्रतिष्ठा की है। उनका आदर्शवाद रोमानी आदर्शवाद नहीं है, व्यावहारिक आदर्शवाद है। उन्होंने बहुत विस्तृत क्षेत्र का चित्रण किया है। यथार्थ और आदर्श के चित्रण के समन्वय से इस चित्रण में एक स्वाभाविकता है। उनका मानना था कि यथार्थवाद हमारी आंखें खोल देता है तो आदर्शवाद ऊंचा उठाकर किसी मनोरम स्थान पर पहुंचा देता है। किसी देवता की कामना करना मुमकिन है लेकिन उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है। यथार्थ और आदर्श के समन्वय से उन्होंने अपने पात्रों में सच्ची प्राण-प्रतिष्ठा की। मानवीय दुर्बलता उनके पात्रों में मिलती है। लेकिन ऐसी दुर्बलताएं ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। अन्यथा निर्दोष चरित्र तो देवताओं में ही मिल सकता है। साहित्य में होरी’, ‘धनिया’ और गोबर’ जैसे 'सर्वहारा' पात्रों को स्थान दिलाने का श्रेय भी प्रेमचंद को ही है।

हिन्दी साहित्य का यह प्रकाश स्तंभ, जो जीवन मूल्यों को बताता था आज हमारे बीच नहीं है पर यह तो निश्चित है कि वे देश के महान सर्वोत्तम रत्न  थे। उन्होंने जनवादी लेखनी को नया आयाम दिया। जीवन को कसौटी पर कसने के लिए उन्होंने एक मापदंड दिया। वे लेखनी के माध्यम से भविष्य का मार्ग दर्शन भी करते थे।  उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का गंभीर प्रयास किया। हिंदी साहित्य में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। उनके दिखाए जीवन का मूल्य और उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक हैं।

17 टिप्‍पणियां:

  1. मानवीय मूल्यों के संस्थापक प्रेमचंद के पाँच कहानियों के संकलन 'सोजे वतन 'में देश प्रेम का भाव प्रमुख था जिसके चलते सरकार ने उसे जब्त कर लिया था। उन्होंने अपने उपन्यासों में ग्रामीण किसान,मजदूर-जनता के उद्धारों के साथ-साथ भारतीय जमींदारों-जागीरदारों एवं तमाम सामंतवादी तत्वों के विरूद्ध विषम परिस्थितियों में भी अपने कठोर संघर्ष का परिचय दिया है। प्रेमचंद की कृतियां आज के युग में भी उतनी ही प्रासांगिक हैं जितनी उनके लेखन-कार्य के दौरान थी। वे केवल काया-त्याग ही किए हैं लेकिन उनकी उपस्थिति को उनकी रचनाएं कहीं न कहीं हमारी साहित्यिक संवेदनाओं का सामीप्य पाकर एहसास करा जाती हैं। साहित्य-जगत के इस अनमोल धरोहर को मैं अपनी ओर से उनके जन्म दिन पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। इसे प्रस्तुत करने के लिए श्री मनोज कुमार जी आपका विशेष आभार। धन्यवाद सहित।

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  2. बहुत सुन्दर -आज इस अजीम गल्पकार के बारे में कितना कुछ जानने को मिल गया -आभार !

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  3. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 01-08-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर सोमवासरीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

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  4. उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का गंभीर प्रयास किया। हिंदी साहित्य में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। उनके दिखाए जीवन का मूल्य और उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक हैं।
    बिलकुल ठीक लिखा है आपने ..पात्र बदलते रहते हैं ...इस जीवन रुपी नाटक के किन्तु कुछ सांचे कभी नहीं बदलते.....!!
    महानात्मा प्रेमचंद जी को मेरा शत शत नमन ...!!

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  5. मुंशी प्रेमचंद जी की १३१ वीं जयंती पर आपकी पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा.

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  6. मुंशी प्रेम चंद ने साहित्यकार के विषय में जो कहा वो अनुकरणीय है --

    साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

    उनको नमन

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  7. आपका विस्तृत विश्लेषण शिक्षाप्रद है । 08 -09 अक्तूबर को 'प्रगतिशील लेखक संघ'के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य मे कार्य-क्रम होंगे । तिथि संभवतः प्रेमचंद जी के अवसान दिवस -08 अक्तूबर को ख्याल रख कर निश्चित हुयी हैं ।

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  8. प्रेमचंद जी के जीवन का बहुत ही जानकारी परक विश्लेषण प्रस्तुत किया………आभार्।
    प्रेमचंद जी को मेरा शत शत नमन .

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  9. Mahan sahityakar premchand ke vishay mein aaj jintna kuch likha jaay utna kam hi kam hai..
    samyik vishleshan ke liye aapka bahut bahut aabhar!

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  10. munshi prem chandr ji jaise prabhaavpur sahitykaar ke baare jitna jana jaye kam hi hoga... jaankari dene ke liye... apka abhar...

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  11. बहुत ही सुन्दर मुन्सी प्रेम चन्द्र जी का हर एक
    निराला है

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  12. आज याद आए हैं प्रेमचंद, आपको भी, मुझे भी।

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  13. मुंशी प्रेमचंद जी के जीवन की जानकारी प्रस्तुत करने के लिए आभार् !

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  14. आज रांची प्रवास के मध्य में हूँ |
    एक मित्र के घर से आपका आभार कर रहा हूँ ||

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  15. आपने बहुत अच्छी जानकारी दी है कालजई साहित्य कार की |बधाई
    आशा

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  16. उपरन्यास सम्राट धनपतराय प्रें चन्द जी को नमन!
    मैंने भी "मयंक" पर एक पोस्ट लगाई है!
    http://powerofhydro.blogspot.com/2011/07/blog-post.html

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  17. मुंशी प्रेमचंद जी की १३१वीं जयंती पर.. आपका विस्तृत-जानकारीपरक , सुन्दर एवं समग्र लेख पढ़कर मन प्रसन्न हो गया |
    प्रेमचंद का साहित्य कल की तरह आज भी प्रासंगिक है और भविष्य में भी रहेगा |

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