बुधवार, 13 जुलाई 2011

भारत : भुखमरी

भारत  :  भुखमरी 


अरुण चन्द्र रॉय

जब आठ साल पहले मनमोहन सिंह जी देश के प्रधानमंत्री बने थे तो पूरी दुनिया में यह पहला  वाकया था कि किसी  विश्व स्तर के  अर्थशास्त्री के हाथों किसी देश की कमान हो. देश को बहुत उम्मीदें थी. जनता को लग रहा था कि महंगाई कम होगी, हर पेट को दाना मिलेगा, जीडीपी घाटा कम होगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. जो हुआ उनमें  टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कामनवेल्थ घोटाला, आदर्श हाउसिंग घोटाला, किसानों  की आत्महत्या और बेहिसाब महंगाई प्रमुख हैं. लेकिन इसमें नया कुछ नहीं है. नया यह है कि कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में हाल में भारत में भुखमरी के अध्ययन  के अर्थशास्त्रियों  ने एक सूचकांक तैयार किया है जिसे इंडिया स्टेट हंगर इंडेक्स नाम दिया है. इस  इंडेक्स का उद्देश्य भारत में भुखमरी और कुपोषण की  स्टडी करना है. इसे इंटरनेशनल फ़ूड रिसर्च इंस्टिटयूट ने तैयार किया है. 


इस संस्थान की  हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत का स्थान ६७वां है  जबकि पाकिस्तान और श्रीलंका सूचकांक में हमसे काफी ऊपर हैं. आर्थिक प्रगति के स्वप्निल पंखों पर सवारी कर रहे भारत के लिए यह शर्मनाक है. देश के 17 राज्यों में किये गए अध्ययन  के अनुसार १२ राज्यों में स्थिति बहुत चिंतनीय है जिसमे छत्तीसगढ़, झारखण्ड, ओड़िसा और मध्यप्रदेश प्रमुख हैं.

यदि रिपोर्ट के निष्कर्षों के पीछे जाएँ तो पाएंगे कि ये राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर हैं. आज़ादी  के बाद से ही ये राज्य देश की  आर्थिक प्रगति में अपने संसाधनों के जरिये महत्वपूर्ण रूप से योगदान कर रहे हैं लेकिन सरकार ने यहाँ के मूल निवासियों की  योजनाओं को क्रियान्वित नहीं किया है. इन क्षेत्रो के लाल कारीडोर  में बदलने  का एक कारण  यह भी  है जिसे  हमारी  सरकार बन्दूक  और बल  से निपटाने का असफल  प्रयास  कर रही है. 

रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर के कुपोषित बच्चों में ४२% बच्चे भारत में हैं. आई ऍफ़ आर आई अपनी रिपोर्ट में कहता है कि "भारत में आर्थिक प्रगति और भूखों की संख्या असमानुपातिक हैं और यह एक चौकानेवाला तथ्य है. 

दुनिया भर के राजनेताओं ने फर्स्ट मिलिनियम गोल के तहत विश्व के पटल से भुखमरी और कुपोषण को २०१५ तक मिटाने का लक्ष्य वर्ष १९९५ में लिया था, आज रिपोर्ट बता रही है कि हम इस लक्ष्य से कोसों  दूर हैं और दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया की स्थिति कई अफ़्रीकी देशों से अधिक ख़राब है. 

और तो और भारत में यह स्थिति तब है जब कि सरकार दुनिया की सबसे बड़ी मुफ्त खाद्यान्न   योजना, सार्वजानिक  वितरण प्रणाली, स्कूली बच्चों के लिए मिड डे मील जैसी  महत्वाकांक्षी योजनायें चला रही हैं. लेकिन परिणाम से लगता है कि ये योजनायें महज कागज़ी हैं.

आने वाले मानसून सत्र में खाद्य सुरक्षा बिल संसद में पेश होने वाला है. इस बिल के पास होने के बाद दो जून की रोटी सबका मौलिक अधिकार होगा लेकिन जब पहले से इतनी योजनायें चल रही हैं, एक और बिल आने से तस्वीर बदल जाएगी इसमें संशय ही है. जब तक इन योजनाओं को जमीनी स्तर पर पहुंचाने  की इच्छा शक्ति केंद्र और राज्य सरकार में नहीं आती है.

9 टिप्‍पणियां:

  1. एक विकराल समस्या है यह.. इस पर सिर्फ बहस ही होती रही है!!

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  2. जब तक उत्पादन और वितरण के साधनों पर समाज का स्वामित्व नहीं होगा ऐसी समस्या मुंह बाएं सामने रहेगी.

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  3. सही कह रहे हैं

    आपकी रचना तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  4. एक विकराल समस्या है यह.. इस पर सिर्फ बहस ही होती रही है!!

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  5. kayi baar to is bhrashtachaar ko jankar aur in aankdo ko padh kar lagta hai ki rashtrpati shasan ho jana chaahiye pure desh me. kam se kam is halat me kuchh to sudhar hoga.

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  6. अरुण जी बहुत ही ज्वलंत समस्या को उठाया है आपने। देखते हैं इस सत्र में क्या निर्णय लिया जाता है।

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  7. भारत दुर्दशा का आपने सटीक खाका खींचा है .ये लोग वायदे बेचतें हैं पांच साल में एक बार रोटी पानी झांसा है .कोंग्रेस ने फांसा है ..

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  8. Tasveer badalni bhi kise hai,kyon hai tasweer badal gaye toh janta uth khari hogi, woh bhi politics main aakar vote mangenge eesliye unhe bhookha hi rakho taki aapni dukan chalti rahe

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