गुरुवार, 21 जुलाई 2011

घिन तो नहीं आती है ?

बाबा नागार्जुन
30 जून 1911 - 5 नवंबर, 1998
घिन तो नहीं आती है ?

पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचका
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ।
छूती है निगाहों को
कत्थई दाँतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच-सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है ?
जी तो नहीं कुढ़ता है ?

कुली-मज़दूर हैं
बोझा ढ़ोते हैं, खींचते हैं ठेला
धूल-धुआँ-भाफ से पड़ता है साबक़ा
थके-माँदे जहाँ-तहाँ हो जाते हैं ढ़ेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अंदर पिछले डब्बे में
बैठ गए हैं इधर-उधर तुमसे सटकर
आपस में उनकी बतकही
सच-सच बतलाओ
नागवार तो नहीं लगती है ?
जी तो नहीं कुढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना था पंखे के नीचे, अगले डब्बे में
ये तो बस इसी तरह
लगाएँगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस-कोस की
सच-सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत ?
जी तो नहीं कुढ़ता है ?
घिन तो नहीं आती है ?

4 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय मनोज कुमार जी ,
    आपके द्वारा प्रस्तुत बाबा नागार्जुन की कविता 'घिन तो नही आती है' पढा । यह उस दौर की घटना है जब बाबा नागार्जुन साहित्य प्रेमियों के आग्रह पर कलकता आया जाया करते थे। कलकता प्रवास के दौरान कुछ समय निकाल कर यहाँ घूम भी लिया करते थे। गांव से रोटी-रोजी की तलाश में आये लोगों की बदहाली एवं परिश्रम करके अपनी जिंदगी सँवारने वाले लोगों की जीवन-चर्या को उन्होंने अपनी उक्त कविता में चित्रित किया है,लेकिन दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि बाबा नागार्जुन जब एक बार कोलकाता से लौट रहे थे उस समय उन्हे हावड़ा स्टेशन तक छोड़ने के लिए कोई नही गया था। बाबा बड़ाबाजार इलाके की अपनी मनपसंद दुकान पर गए एवं एक पान खाकर पैदल ही स्टेशन चल पड़े थे। (कहीं पढ़ा था) इस घटना का उन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उसके बाद उनका कलकता आना संभव नही हुआ। भीड़-भाड़ में ट्राम की सवारी करना कलकता के प्रवास के दौरान उन्हे अच्छा लगता था। इस दुर्लभ कविता को प्रस्तुतु करने के लिए आपका विशेष आभार।

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  2. कोलकता की ट्राम का दृश्य साकार हो गया ...बहुत सशक्त अभिव्यक्ति है बाबा नागार्जुन की ..आभार इसे यहाँ पढवाने का ..

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