शनिवार, 16 जुलाई 2011

प्रेम


सुमित्रानन्दन पन्त

प्रेम

मैंने
गुलाब की
मौन शोभा को देखा!
उससे विनती की
तुम अपनी
अनिमेष सुषमा की
शुभ्र गहराइयों का रहस्य
मेरे मन की आँखों में
खोलो!
      मैं अवाक्‌ रह गय!
      वह सजीव प्रेम था!
      मैंने सूँघा,
      वह उन्मुक्त प्रेम था!
      मेरा हृदय
      असीम माधुर्य से भर गया
मैंने
 गुलाब को
 ओठों से लगाया!
 उसका सौकुमार्य
 शुभ्र अशरीरी प्रेम था !
   मैं गुलाब की
 अक्षय शोभा को
     निहारता रह गया!
                        [‘कला और बूढ़ा चाँद’ से]

7 टिप्‍पणियां:

  1. पन्त जी की अमूल्य कविता के प्रस्तुतीकरण हेतु धन्यवाद.

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  2. अमूल्य कविता पढवाने के लिये आभार्।

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  3. प्रकृति के सुन्दर विम्ब लिए प्रेम के उद्दात स्वरुप के दर्शन कराती कविवर पन्त जी की अमूल्य कविता के प्रस्तुतीकरण हेतु आपका बहुत-बहुत आभार !

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  4. सुंदर रचना पढ़वाने के लिए आभार

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  5. अमूल्य कविता पढवाने के लिये आभार्।

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  6. पंत जी की कविता पर टिप्पणी कर्ने की काबिलियत मुझमें नहीं है,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  7. पन्त जी कविता को पढ़वाने के लिए शुक्रिया.....

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