मंगलवार, 26 जुलाई 2011

तेरी बिंदियाँ रे!


तेरी बिंदियाँ रे!
सलिल वर्मा
बहुत पुरानी एक घटना का वर्णन, जो मेरे परिवार के लगभग हर सदस्य को मुखस्थ है, आज के विषय के अनुसार बिलकुल उपयुक्त लग रही है. प्रस्तुत है उस घटना के दो पात्र मेरे अनुज और उसके एक मित्र के मध्य हुए वार्त्तालाप का एक अंश:


अरे यार! कहाँ जा रहे हो?
संज़य के घर.
कुछ ख़ास?
पूज़ा है.
अच्छा है. धर्म-कर्म करना चाहिए.
क्या करें. ज़ाना ही पडता है.
क्यों?
मज़बूरी है, समाज़ में करना पडता है.


ध्यान दें कि मेरे अनुज के प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में उसके मित्र ने जितने भी वक्तव्य दिए हैं सब में उच्चारण की भूल की है. यदि यह उच्चारण की भूल है तो अवश्य ही उनके लेखन में भी परिलक्षित होगी.


उर्दू भाषा के कई शब्द हिन्दी में इस तरह घुल-मिल गए हैं कि दोनों में विभेद करना दुरूह हो गया है. दोनों भाषाओं की वर्णमाला में मूलभूत अन्तर यही है कि उर्दू में कई अक्षर हिन्दी के समान हैं और उर्दू में भी पाए जाते हैं, किन्तु उन्हीं अक्षरों का उच्चारण भिन्न प्रकार से किया जाता है. इस उच्चारण के कारण ही वे उर्दू वर्णमाला का नया वर्ण बन जाते हैं.  


उदाहरण के लिए उर्दू का अक्षर जीम जिसे ध्वनि के लिए प्रयोग किया जाता है, जबकि ज़ाल वर्ण का उच्चारण ज़ है. वैसे ही क़ाफ क़ के लिए और काफ के लिए प्रयुक्त होता है. हिन्दी में इन्हें अपनाने के साथ सबसे बड़ी समस्या इनके उच्चारण की थी और लिपिबद्ध करने की भी. लिपिबद्ध करना इसलिए भी अनिवार्य हो गया था कि उच्चारण स्पष्ट हो सके.


इसका सरल उपाय यह निकाला गया कि इन वर्णों को लिखते समय, देवनागरी के उन वर्णों के नीचे एक बिंदी लगाई जाए (जिसे उर्दू में नुक्ता कहते हैं). इसका कोइ वैज्ञानिक कारण नहीं रहा होगा, सिवा इसके कि उन शब्दों को उच्चारित करते समय यह ध्यान रहे कि उन वर्णों का उच्चारण विशेष प्रकार से करना है.


इस लेख के प्रारम्भ में जो वार्तालाप के अंश दिए गए हैं, उसमें सबसे बड़ी भूल यही है कि उस व्यक्ति ने प्रत्येक वाक्य में का प्रयोग ज़ के रूप में किया है. जबकि किसी भी शब्द में उसकी आवश्यकता नहीं थी. प्रायः इस तरह की स्थितियां व्यक्ति को हास्य का पात्र बना देती है. इस घटना को याद कर हम आज भी हँसते हैं.


उर्दू-शब्दों के हिन्दी में प्रयोग करने के कारण एक और सामान्य भूल जो देखने में आती है वह है उर्दू के उन वर्णों का उच्चारण अत्यधिक बलपूर्वक करना. जैसे ग़ैरत में इतने बल प्रयोग से उच्चारण करना कि गले की बलगम बाहर आ जाए. ऐसे ही कोई व्यक्ति किसी तेल-फुलेल वाले की दुकान पर जाकर पूछने लगा, क्या आपके पास गुलरोग़न का तेल मिलेगा? लेकिन यह बोलते समय उन्होंने इतना जोर लगाया कि दुकानदार को कहना पड़ा, मिल तो जाएगा, लेकिन उतना गाढा नहीं होगा जितना आप ढूंढ रहे हैं.


अब ज़रा और फ़ की करामात भी देखिए. किसी ने अपनी प्रेमिका की प्रशंसा में कह दिया कि दुनिया में तुमसे अच्छा फ़ूल मैंने नहीं देखा. और बेचारे का प्यार परवान चढाने से पहले ही टूट गया. प्रेमिका उर्दू की अच्छी समझ रखती थी और उसने समझ लिया  कि फ़ूल तो अंग्रेज़ी का शब्द है जिसका अर्थ है मूर्ख. अब एक मामूली सी बिंदी ने सब गुड़ गोबर कर दिया. एक शब्द तो ऐसा है जिसमें हिन्दी और उर्दू का अंतर भी नहीं दिखाई देता. वह शब्द है फिर. लेकिन बहुत से लोग इसे बोलते हैं फ़िर. टीवी सीरियल्स में तो धडल्ले से यह प्रयोग होता है.


एक प्रोग्राम में जावेद अख्तर साहब ने भी इस बात पर अपनी शिकायत दर्ज़ की थी. लेकिन असर शायद ही होता दिखता है. मेरे अभिन्न मित्र जब भी कोइ आलेख लिखते हैं तो मुझे पहले भेज देते हैं. उनका कहना है कि वे नहीं समझ पाते कि कहाँ बिंदियाँ लगानी है कहाँ नहीं. लिहाजा कहीं नहीं लगाते.

मेरे प्यारे दोस्त हैं और उससे भी प्यारी है उनकी बात. उनका कहना है, एक रचना भेज रहा हूँ. इसे बिंदियों से सजाकर दुल्हन बना दो!

11 टिप्‍पणियां:

  1. जरूरी तो नही कि हर विवाहित को बिन्दिया लगाने का शौक हो, कुछ तो लापरवाही वश कुछ एलर्जी से और कुछ फैशन के मद्दे नज़र नही भी लगाती। मगर शब्दों मे बिन्दी न लगायें तो बिन ब्याहे ही रह जाते हैं। रोचक आलेख। ये बिहारी बाबू भी बाल की खाल उतारने लगे रहते हैं{मज़ाक मे कह रही हूंम] शुभकामनायें\

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  2. रोचक प्रस्तुति .. बिंदी से हिंदी को सजा दिया या सज़ा दिया ..नुक्ते से कितना अन्तर आ जाता है ..

    सही कहा है

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  3. salil vermajee kuch bhi likhen unka andaz behad rochak hota hai.....yahan bhi hai.

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  4. sangeeta di!
    (mazak men) aapne pichhali kavitaa men likhaa thaa..
    आँधियों के साथ
    ये फन मुझे
    ab bataiye.. fan (saanp kaa) yaa fan (kalaa)hai.. ek bindee n hione se baat kitnee zahreelee ho gayee..
    sadar!
    salil

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  5. बिल्कुल सही कहा…………नुक्ते से ही अर्थ बदल जाता है।

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  6. ऐसी ही एक और घटना का उल्लेख प्रासंगिक होगा यहाँ पर. मेरी पोस्टिंग जब सीतामढी में थी तो रिक्शा बस स्टैंड की ओर कपडे के एक बड़े से बाजार से होकर गुजरता था. उसी बाज़ार में एक साड़ी की दूकान थी नाम था,'चाहत' और 'च' के नीचे था एक नुक्ता...कई बार नुक्ता न देने से उतनी भद नहीं पिटती जितनी उसके गलत प्रयोग से...

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  7. नुक़्ते के हेर-फेर से खुदा जु़दा हो जाते हैं। बहुत सुन्दर। ध्वनियाँ बड़ी ही रहस्यमय हैं। लेकिन टोकने पर कुछ मित्रों का बुरा लग जाता है। एक हमारे मित्र हैं वे कहते हैं- यह व्याकरण का खूँटा हमेशा क्यों गाड़ते रहते हैं। अच्छा है।

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  8. भाषा का लालित्य शुद्धता में ही है। अतः हिंदी संस्कृत के शब्दों की वर्तनी पर तो ध्यान दिया ही जाए साथ ही विदेशी भाषाओं से आगत शब्दों के प्रति भी सचेत रहना ज़रूरी है। ड़, ढ़, ज़ और फ़ तथा फ़ॉ ध्वनियों के प्रति विशेष ध्यान की आवश्यकता है।

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  9. सलिल जी बहुत ही सही पोस्ट लगा है आपने।

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