गुरुवार, 14 जुलाई 2011

भारतीय साहित्य का स्वरुप 1942 के बाद...

भारतीय साहित्य का स्वरुप 1942 के बाद ...

164323_156157637769910_100001270242605_331280_1205394_nअनामिका

छायावाद के पतन और प्रगतिवाद के अभ्युदय तक हिंदी साहित्य में बहुत कार्य हो चुका  था. 1936  में प्रेमचंद जी, 1937 में जय शंकर प्रसाद जी तथा 1942 में शुक्ल जी के निधन के उपरान्त हिंदी साहित्य में कोई भी उल्लेखनीय कार्य नहीं हो रहा था और इस कुंठा की स्थिति में हिंदी साहित्यकारों ने यह घोषणा की कि हिंदी साहित्य में गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो गयी है और हिंदी का भविष्य अन्धकार में है. इस समय देश की परिवर्तित परिस्थितियों का भी प्रभाव था. सन 1942 के देश व्यापी आन्दोलन और सन 1946 में द्वितीय विश्वयुद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों ने भारत को दासता के चंगुल से मुक्त कर दिया था. इस युद्ध में इंग्लैण्ड भी इतना निर्बल और निर्धन हो चुका था कि  उसने भारत से चले जाने में ही भलाई समझी. इन सब परिस्थितियों के बदलने से साहित्य एवं जीवन के प्रति भारतियों के दृष्टिकोण में अंतर आ रहा था. स्वाभिमान और विद्रोह की भावना से परिपूर्ण राष्ट्रभाषा में ध्वंस एवं विनाश के स्वरों के स्थान पर उल्लास पूर्ण  नव-निर्माण के स्वर दिखाई देने लगे थे. सन 1947 में देश के आजाद होते ही सारा हिंदी साहित्य एक बारगी स्वदेश प्रेम एवं जन प्रेम के सुमधुर गीतों से गूँज उठा था. परन्तु यह उल्लास क्षणजीवी बनकर ही रह गया, क्यूंकि एक लम्बे संघर्ष और साधना  के पश्चात प्राप्त इस आजादी ने जन-मानस की आशा - आकांक्षाओं की पूर्ति नही की थी. आज़ादी का उल्लास भावात्मक और क्षणिक बनकर ही समाप्त हो गया जिस से उसका जन-कल्याणकारी रूप उभर कर सामने नहीं आ सका.

आज़ादी के उल्लास का खुमार उतरा तो साहित्य ने पुनः जीवन का निरीक्षण किया और अपने को नयी नयी समस्याओं से आक्रांत पाया. हमें यह आज़ादी 1946 और 1947 के भयंकर जनसंहार एवं देश के विभाजन के पश्चात प्राप्त  हुई थी इसलिए शरणार्थियों की समस्या  मुंह  बाए सामने खड़ी थी. स्वतंत्रता महंगी पड़ रही थी, जिससे साम्प्रदायिकता की भावना ने देश में साम्प्रदायिक वैमनस्य का भयानक  वातावरण उत्पन्न कर दिया था. प्रतिक्रियास्वरूप साहित्य में भी परिस्थितियों की इस विषमता का स्वर उसी शक्ति के साथ प्रतिध्वनित हुआ, जिस उमंग के साथ उल्लास मुखरित हुआ था.

आज़ादी के पश्चात जीवन-निर्वाह की समस्या विषमतर होती चली गयी. विभाजन के कारण देशव्यापी महंगाई और व्यापारियों की मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति ने साधारण जनता को संकट में डाल दिया. पूंजीपति प्रत्यक्ष रूप से और विदेशी पूंजीपति अप्रत्यक्ष रूप से जनता के धन एवं श्रम का शोषण करने लगे. दूसरी ओर  सरकार विभिन्न योजनाओं की पूर्ती के लिए जनता पर नए नए करों का बोझ डालने लगी और विदेशी ऋण ले ले कर जीवन निर्वाह को और भी भयंकर बनाती रही. इन परिस्थितियों के विरुद्ध साहित्य में भी विद्रोह और आक्रोश के स्वर फूट पड़े.

हिंदी की इस साहित्यिक त्रिमूर्ति के निधन के बाद तथा देश की विषमतर परिस्थितियों  के चलते साहित्यकारों की सृजनात्मक शक्तियां कुंठित हो गयी थी. हिंदी में आगे इन तीनो जैसी सशक्त युग प्रवर्तन कारी प्रतिभाओं के दर्शन नहीं हुए. इन तीनो के साहित्य में कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आलोचना और कविता की इन प्रमुख विधाओं के उच्चतम रूप के दर्शन हुए थे . परन्तु इस त्रिमूर्ति के निधन से रिक्त हुए स्थान की पूर्ति कोई नहीं कर पाया. महादेवी, निराला, पन्त, वृन्दावनलाल वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डा. रामविलास शर्मा आदि साहित्य सृजन कर तो रहे थे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण युग पर समग्र प्रभाव डालने वाली कृतियाँ प्रस्तुत करने में सभी असमर्थ ही रहे. वर्माजी निरंतर साहित्य साधना में रत रहे और उन्होंने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपन्यास हिंदी संसार को भेंट किये परन्तु प्रेमचंद के समान वे अपना पूर्ण प्रभाव नहीं डाल पाए. हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि आलोचक अभी निर्माण मार्ग पर थे. उनके दृष्टिकोण में नवीनता, विविधता और व्यापकता तो आ रही थी, परन्तु शुक्ल जी जैसी सशक्त सारग्राहिणी प्रतिभा और पुष्ट मौलिक चिंतन का अपेक्षित रूप नहीं उभर पा रहा था. इस स्थिति को देख कर पुराने खेमे के आलोचकों ने आवाज़ उठाई कि हिंदी साहित्य में गतिरोध आ गया है और राष्ट्र भाषा  की अधिकारिणी हिंदी का भविष्य उज्जवल नहीं रहा है.  इस दृष्टिकोण का एक और भी कारण था - पुराने आलोचक और साहित्यकार अपनी पुरानी मान्यताओं और सीमाओं से ही चिपके हुए थे. साहित्य की समालोचन का उनका एक निश्चित मापदंड बन गया था और उसी के आधार पर वे नवीन साहित्य को परखने का प्रयास करते थे. जब जब उन्हें इस साहित्य में अपनी पुरानी मान्यताओं का खंडन अथवा अवहेलना होती दिखाई पड़ती वो हिंदी के भविष्य के प्रति सशंकित हो उठते थे.

देश की इस विषम परिस्थिति और साहित्य की इस अंधकारमय स्थिति से उबरने के लिए हिंदी संसार अपनी समृद्धि और अपने सम्मान की रक्षा के लिए प्राणप्रण से जुट गया. हिंदी को समृद्ध बनाने के प्रयास शुरू हो गए. संविधान द्वारा हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया. अब हिंदी का दायित्व और भी बढ़ गया.  नए साहित्यकारों ने नवीन प्रयत्न कर कर के साहित्य को विस्तार दिया. नए नए दृष्टिकोण उभरे, समस्याओं के  नए नए हल प्रस्तुत किये गए. लेकिन अभी भी वो गहराई नहीं आ पाई थी जो हम प्रसाद-प्रेमचंद-शुक्ल के युग में देख चुके थे. विस्तार के साथ उथलापन भी आया....क्यूंकि गहराई तो दीर्घ साधना के उपरान्त ही आती है. विस्तार के बाद गहराई का आना अनिवार्य होता है . पिछले तीन दशकों का हिंदी साहित्य उसी विस्तार का रूप है. अब धीरे धीरे इस में गहराई आ गयी है.

इस से अगला क्रम अगले गुरुवार की पोस्ट में डालने की कोशिश करुँगी।

10 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी को औपचारिक रूप से राष्ट्रभाषा घोषित करने के पूर्व संविधान में इसे राजभाषा बनाया गया है ताकि वह राष्ट्भाषा के आसन पर पूर्ण सक्षम होकर विराजमान हो सके। धन्यवाद।

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  2. देश की इस विषम परिस्थिति और साहित्य की इस अंधकारमय स्थिति से उबरने के लिए हिंदी संसार अपनी समृद्धि और अपने सम्मान की रक्षा के लिए प्राणप्रण से जुट गया. हिंदी को समृद्ध बनाने के प्रयास शुरू हो गए. संविधान द्वारा हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया. अब हिंदी का दायित्व और भी बढ़ गया. नए साहित्यकारों ने नवीन प्रयत्न कर कर के साहित्य को विस्तार दिया. नए नए दृष्टिकोण उभरे, समस्याओं के नए नए हल प्रस्तुत किये गए.

    यह साहित्येतिहास है या मूल्यांकन? अथवा सब कुछ एकसाथ. जो भी है रोचक, प्रवाहपूर्ण और सरस है. बधाई. अगले अंक की प्रतीक्षा है.

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  3. आज के लोगों को उस समय की स्थिति से अवगत कराने हेतु धन्यवाद.

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  4. "महादेवी, निराला, पन्त, वृन्दावनलाल वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डा. रामविलास शर्मा आदि साहित्य सृजन कर तो रहे थे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण युग पर समग्र प्रभाव डालने वाली कृतियाँ प्रस्तुत करने में सभी असमर्थ ही रहे."... तथ्यात्मक रूप से यह स्टेटमेंट गलत है... वृन्दावनलाल वर्मा जी ने कालजयी उपन्यास दिए... रामविलास शर्मा को हिंदी आलोचना को नई दिशा देने का श्रेय जाता है... महादेवी और निराला, पन्त आदि ने हिंदी को विश्व साहित्य में पहचान दिलाया है...

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  5. विवेचना से पूर्णतः सहमत नहीं हुआ जा सकता....किंचित यह दृष्टिकोण एकांगी है...पर फिर भी विमर्श प्रशंसनीय एवं स्वागत योग्य है...

    आभार...

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  6. आदरणीय पाठक गण आप सब की बहुत आभारी हूँ जो आपने मेरे लेख को पढ़ कर टिप्पणियां दी. ये तो आप सभी जानते हैं ऐसे लेखों के तथ्य अपने दिमाग की उपज नहीं होते बल्कि एकत्रित साहित्यिक पाठ्य सामग्री से प्राप्त होते हैं. तो जो कुछ मैंने लेख में लिखा वो सब भारतीय साहित्य की विवेचना से सम्बंधित सामग्री से प्राप्त किये गए हैं. इसलिए यह दृष्टिकोण एकांगी नहीं है.

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  7. आपने इस श्रृंखला की अच्छी शुरुआत की है। इससे विषय को ऐतिहासिक संदर्भ में जानने और समझने में सुविधा मिलेगी।

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  8. अनामिका जी की यह श्रृंखला साहित्य का विद्यार्थी बना कर ही दम लेगी मुझे!!आभारी हूँ!!

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  9. हिंदी साहित्य के इतिहास की बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक जानकारी. अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा..आभार

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