सोमवार, 25 जुलाई 2011

लक्ष्यविहीन सा पथ ..


मैं जलधि
मरुस्थल का
खारेपन के साथ
मुझमे रेत भी
शामिल है
उड़ चलूँ मैं
आँधियों के साथ
ये फन मुझे
हासिल है .
मुट्ठी में बंद कर
बांधने की करो कोशिश
तो रेत की तरह ही
मुट्ठी से फिसल जाती हूँ
अतृप्त सी हैं इच्छाएं
और है गरल कंठ में
तृप्त होने के भाव का
स्वांग सा रचाती हूँ .
मिल कर मुझसे सब
कुछ भ्रमित से हो जाते हैं
भूल जाते हैं सत्य को कि
गुल के साथ खार भी आते हैं...
उम्मीदों के चमन में लोग
ख्वाहिशों के फूल खिलाते हैं
नाउम्मेदी के कांटे फिर
विषैले दंश ही चुभाते हैं .
न है मेरी कोई मंजिल
और न ही कोई राह है
मैं बस निरंतर
चलती चली जाती हूँ
लक्ष्यविहीन से पथ पर
बस अग्रसित हो जाती हूँ....
--
संगीता स्वरुप

23 टिप्‍पणियां:

  1. संगीता जी!

    कविताओं में इतनी निराशा क्यों? निराशा के सागर से निकल आशा की गंगा की धारा पकड़ें। शुभकामना।

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  2. इस चिंतन से कुछ सार्थक अवश्य निकलेगा।

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  3. लक्ष्यविहीन? आप ऐसे पथ पर चल ही नही सकती जरूर सपना देखा होगा। शुभकामनायें।

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  4. अप्रतिम भाव की अप्रतिम रचना .शब्द सागर डुबोती तैराती ,लुभाती सी पीड़ा से सहलाती सी .

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  5. मैं बस निरंतर
    चलती चली जाती हूँ
    लक्ष्यविहीन से पथ पर
    बस अग्रसित हो जाती हूँ....

    दार्शनिक चिंतनयुक्त कविता...

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  6. मैं जलधि
    मरुस्थल का
    खारेपन के साथ
    मुझमे रेत भी
    शामिल है
    उड़ चलूँ मैं
    आँधियों के साथ
    ये फन मुझे
    हासिल है .


    सूफी दर्शन से परिपूर्ण सुंदर रचना के लिए बधाई।

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  7. bahut sundar kavita. laksyaviheen to vah bhi nahin hota laksya ko janata bhi nahin hai. aap to prabuddh hain - ek anakahi shiksha isamen jhalak rahi hai.

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  8. पथ कोई लक्ष्यविहीन नही होता…………जरूर ये पथ भी आपको एक नयी दिशा देगा…………एक नयी रौशनी…………भावों का सुन्दर चित्रण्।

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  9. Nice post .
    आपकी इस पोस्ट का चर्चा आपको आज सुबह मिलेगा ‘ब्लॉगर्स मीट वीकली‘ में।
    आप सादर आमंत्रित हैं।

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  10. उम्मीदों के चमन में लोग
    ख्वाहिशों के फूल खिलाते हैं
    नाउम्मेदी के कांटे फिर
    विषैले दंश ही चुभाते हैं ...jindagi ki hakikat hai...jab bhi kuch biprit hota hai to hame kast hota hai..kintu yadi phook khilana nishkam ho to kaanton se hone wali peeda ki anubhuti kam hogi..sadar pranam

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  11. सार्थक चिंतन की कविता...

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  12. मैं बस निरंतर
    चलती चली जाती हूँ
    लक्ष्यविहीन से पथ पर
    बस अग्रसित हो जाती हूँ....
    Hmmmmmmm....shayad ham sabhee ko aisaa kabhi na kabhi mahsoos hota hai!

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  13. वो मांझी ले चल पार . रेत के सागर में दर्शन के बोल . अगाध जलधि हो आप . हम गुन रहे है जलते पयोधि का तप .

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  14. समाधि की -सी स्थिति में सुख और दुःख का बोध समाप्त हो जाता है .आशा -निराशा के बीच अंतर नहीं रह पता .ऐसी स्थिति संतों को ही कठिन साधना के बाद मिलत i है .
    कुछ ऐसी ही ऊँचाइया परिलक्षित हो रही है इस रचना में .

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  15. मुट्ठी में बंद कर
    बांधने की करो कोशिश
    तो रेत की तरह ही
    मुट्ठी से फिसल जाती हूँ
    अतृप्त सी हैं इच्छाएं....
    बेहतरीन सन्देश

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  16. न है मेरी कोई मंजिल
    और न ही कोई राह है
    मैं बस निरंतर
    चलती चली जाती हूँ
    - कभी कभी लगता है ऐसा, पर यही सच नहीं है संगीता जी .बीत जायें ये निराशा और थकान भरे क्षण,आगे राह है और मंज़िल भी!

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  17. सुधीर कुमार सिंह दीक्षित22 अगस्त 2011 को 7:58 pm

    छोटा करके देखिए जीवन का विस्तार, आंखों भर आकाश है, बाहों भर संसार

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